Wednesday, 26 August 2020

आओ!पर्वत से ऊँचाई ले लें

 आओ!पर्वत सेऊँचाई ले लें,

दिल में सागर-सी गहराई ले लें। 

धरती से सर्वस्व लुटाना सीखें,

मानव हैं मन में मानवता ले लें।


पावन नाम जग में राम  का ही है,

मनभावन स्याम नाम कम नहीं है।

धाम वृन्दावन या धाम अयोध्या, 

बरसाता जीवन में सावन ही है।


डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'

सागर-लहरें

 

सागर-लहरें-----

क्षितिज से निकलकर,      मचलती,थिरकती
जलधि की उमंगें
चली आ रही हैं
         तरंगों का उठना फिर
          उठकर के गिरना,
          वो टकराने तट से
           चली आ रही हैं
उर्मियाँ हैं उदधि की
चमकती,दमकती
  हमें खुशियाँ देने                                       
  चली आ रही हैं
            तन-मन भिगोकर
            किनारों को छूकर
            दे भावों के मोती
             चली जा रही हैं
गरजकर,उछलकर
खजाना लुटाकर
नर्तन-सी करती
चली जा रही हैं
               जहाँ भी निहारूँ
               लहरें ही लहरें हैं
               नयनों में अब तक
               वो लहरा रही हैं ।।

      डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
     रचना-तिथि--18.6.2020

प्रकाश

 

नमन भावों के मोती 🙂👏🏼
दिन-मंगलवार
दिनांक-25.8.2020
विषय-प्रकाश
1.आदि देव पर ही टिकी,जीव-जगत की आश।
बिन उसके ब्रह्माण्ड में, होता नहीं  प्रकाश।।
2.अन्तर्मन ज्योतित रहे,सब ज्योतित हो जाए।
लौ उमंग की जब बढ़े,प्रभु-प्रकाश मिल जाए।।
स्वरचित
डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखंड)

मन की बात

         मन की बात


मन की बातें जिससे कह दें,        क्यों धोखेबाज निकलते हैं?

विश्वास करें जब भी जिसपर,

क्यों वे गद्दार निकलते हैं?


सम्मुख मीठा-मीठा बोलें,

पीछे षड्यन्त्र चलाते हैं।

कुटिल चाल,झूठे वचनों से

अपनों को खूब सताते हैं।।


कुछ चाटुकारिता,छल-बल से

सच कहने में ही अटक रहे।

अपने को सबकुछ समझ रहे,

बस स्वार्थ-लाभ में भटक रहे।।


अच्छे को अच्छा कहने में,            कब,कहाँ बुराई होती है?

यदि करें प्रशंसा औरों की,

 तो नहीं हँसाई होती है।।


टेढ़ा आँगन उसका होता,

जो नाच नहीं कर पाता है।

वो खाली ढोल बजाता है,

आधी गागर छलकाता है।।


मन से,वचनों से,कर्मों से,

दिल में कड़वाहट उचित नहीं।

कथनी-करनी का भेद जानते,

इतने भी हम भ्रमित नहीं।।

     --------××××-------

      डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत

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