मन की बात
मन की बातें जिससे कह दें, क्यों धोखेबाज निकलते हैं?
विश्वास करें जब भी जिसपर,
क्यों वे गद्दार निकलते हैं?
सम्मुख मीठा-मीठा बोलें,
पीछे षड्यन्त्र चलाते हैं।
कुटिल चाल,झूठे वचनों से
अपनों को खूब सताते हैं।।
कुछ चाटुकारिता,छल-बल से
सच कहने में ही अटक रहे।
अपने को सबकुछ समझ रहे,
बस स्वार्थ-लाभ में भटक रहे।।
अच्छे को अच्छा कहने में, कब,कहाँ बुराई होती है?
यदि करें प्रशंसा औरों की,
तो नहीं हँसाई होती है।।
टेढ़ा आँगन उसका होता,
जो नाच नहीं कर पाता है।
वो खाली ढोल बजाता है,
आधी गागर छलकाता है।।
मन से,वचनों से,कर्मों से,
दिल में कड़वाहट उचित नहीं।
कथनी-करनी का भेद जानते,
इतने भी हम भ्रमित नहीं।।
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डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत