Wednesday, 2 December 2020

सन्तोषं भाव पर रचना

 

[27/10, 16:22] डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत': सन्तोष-भाव पर रचना---

विधि का लिखा जो भी मिला सन्तोष होना चाहिए।

रूप,रंग,शरीर-सौष्ठव,संतति,धन-सम्पदा,
प्रभु-कृपा से जो मिले सन्तोष होना चाहिए।
पद-प्रतिष्ठा,मान-निन्दा,लाभ-हानि,सुख-आपदा,
है परम दानी देवता,संतोष होना चाहिए।।
सत्य है,शिव भी वही,पावन सदा,है सुन्दरम्,
मिलता वही जो भाग्य में सन्तोष होना चाहिए।
कर भरोसा विश्व-गुरु पर,जिसने भेजा है धरा पर।
कर्म-रत तन, धर्म में मन, संतोष होना चाहिए।।
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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखण्ड)
[27/10, 16:25] डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत': प्रणाम काव्य-धारा---
दिए गये शब्द---हाला,प्याला,मधुशाला

प्रिय!तुम मुझको आज पिला दो,
प्रेम,प्यार-पूरित प्याला।
बाँह छुड़ाकर क्यों जाते हो?
आज न जाओ मधुशाला।।
हाला पीकर नहीं मिटेगी,
अन्तरमन की ये ज्वाला,
मदिर-मदिर मदमस्त हृदय से,
बुला रही है मधुबाला।।
जीवन है अनमोल,घोल देती है विष,मदिरा,हाला।
रोता है परिवार मगर,
तिल-तिल मरता पीने वाला।।
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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी (नैनीताल)उत्तराखंड।
[27/10, 16:28] डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत': सोरठा
1.वसन,घटा सम नील, सौम्य राधिका, गौर तन।नयन गहन द्वय झील, देखि स्याम बेसुध भये।।

2.सुस्मित चितवन रेख, निरख चम्पा सकुचाई।
गन्धराज को देख,खिल गई रजनीगंधा।।

3.इन्द्रधनुष-रंग-सात,विविध रंग, शंकर-धनुष।
अरिदल को दे मात,चाप श्रीराम धरैं जो।।
4.
पश्चिम दिक् कर लाल,भानु अब अस्त हो रहा।
सिंदूरी रँग डाल,उदित कल पूरब होगा।।
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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
[18/11, 08:26] डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत': ताटंक छंद---मात्रा--30।16,14पर यति।तुकान्त-समचरण।अन्त में तीन गुरु।

याद आ रहा हमें बचपना,बीत गया जो राहों में।
छोटे-छोटे पग धरते थे,घर,गलियों,दो राहों में।
सुबह हुई कब शाम हो गई?कुछ कब लेना-देना था।
रंग-बिरंगे,चन्द खिलौने, लेकर दिवस बिताना था।
घर का काम न करना पड़ता ,मन्दिर नहीं सजाना था।
पढ़ने-लिखने  में खेल-खेल,हमको समय बिताना था।
गिल्ली-डंडा,छुपम-छुपाई,अड्डू ,कंचे या गोली।                         दूर-दूर तक चल देती थी,हम सब बच्चों की टोली।।

डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी, नैनीताल, (उत्तराखण्ड)
8171881903

नवाक्षरावृत्ति

 

नवाक्षरावृत्ति----211-122-122

माँ मधुर वीणा दिखा दो,
राग दरबारी सिखा दो।

गान अपना बोल दो माँ,
तान अपनी  खोल दो माँ।

गीत सबको प्रीत देगा,
राग मन को जीत लेगा।

वेद तुमने ही रचाए,
भेद सबसे ही छिपाए।

हो नमन पद्मासिनी का,
हो भजन हँसासिनी का।।

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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखण्ड)

मनहर घनाक्षरी

  

मनहर घनाक्षरी---8 8 8 7समीक्षार्थ

                                             उषा ने चलाए बान,धरती में आई

जान,

ओस ने बचाए प्रान, लहराए धान हैं।

सौरभ-सुमन-संग, पवन ने भरे रंग, हौले-हौले छाई अंग,बावरी अनंग है।।

घूँघट भी खोल रही,नथनी भी डोल रही,

पायल भी बोल रही, प्रेम-रस घोलती।

मदिर-मदिर चाल,बिंदिया सजी है भाल,

आनन्द से लाल गाल,चली डोरे डालती।

मनुज भ्रमित हुए,निरख चकित हुए 

मस्तक नमित हुए,खिली मधुमालती।

रातरानी छिप गई,चम्पा तो महक गई,

कलियाँ चटख गईं,जिन्हें उषा पालती।।

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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत' 

हल्द्वानी,नैनीताल (उत्तराखण्ड) 

 


चित्राधारित कविता लेखन

 तन-मन-धन सब छोड़ के मीरा, कान्हा में ही समा रही।

मधुर पदों, भजनों,गीतों में एकतारा को बजा रही।।


डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'

हल्द्वानी,नैनीताल (उत्तराखण्ड) 


चित्राधारित कविता लेखन

 छवि निरखत,बाँकी चितवन कर गौरा मोह रही भोले को।

लास-नृत्य करते-करते शिव देख रहे जगदम्बे को।

ता थेइ थेइ तत् थाप पगों से,रचें अंग-मुद्राओं को।

देख मुदित हैं शिव-शंङ्कर,गिरिजा की काम-कलाओं को।।


डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'

हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखण्ड) 

हास्य-व्यंग्य दोहे----

 हास्य-व्यंग्य---दोहेहास्य-व्यंग्य---दोहे


कवि,लेखक जितने मिले,सबका बुरा है हाल।

आँखों में चश्मा चढ़ा,पिचक रहे हैं गाल।।

साथियो!----

अर्द्धरात्रि तक जगे रहें,लिखने से मजबूर।

तन का ध्यान रखें नहीं, रोग लगे भरपूर।।

साथियो!----

दाँतों में कीड़ा लगा,आँतों में सब रोग।

फिर भी क़लम चला रहे,छोड़ दिए सब भोग।।

साथियो!----

केवल भावों में जिएँ,नहीं चाहिए माल।

सोचें, कैसे पड़ जाए,कण्ठ विजय की माल।।

साथियो!---

परहित ही जीते रहे,गाते रहते छंद।

जनहित ही रचना रचें,धन्य-धन्य कवि-वृन्द।।

साथियो!


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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'

हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखण्ड)



कवि,लेखक जितने मिले,सबका बुरा है हाल।

आँखों में चश्मा चढ़ा,पिचक रहे हैं गाल।।

साथियो!----

अर्द्धरात्रि तक जगे रहें,लिखने से मजबूर।

तन का ध्यान रखें नहीं, रोग लगे भरपूर।।

साथियो!----

दाँतों में कीड़ा लगा,आँतों में सब रोग।

फिर भी क़लम चला रहे,छोड़ दिए सब भोग।।

साथियो!----

केवल भावों में जिएँ,नहीं चाहिए माल।

सोचें, कैसे पड़ जाए,कण्ठ विजय की माल।।

साथियो!---

परहित ही जीते रहे,गाते रहते छंद।

जनहित ही रचना रचें,धन्य-धन्य कवि-वृन्द।।

साथियो!


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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'

हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखण्ड)


ताटंक छंद

 

ताटंक छंद---मात्रा--30।16,14पर यति।तुकान्त-समचरण।अन्त में तीन गुरु।

याद आ रहा हमें बचपना,बीत गया जो राहों में।
हम छोटे-छोटे पग धरते थे,घर,गलियाँ,दो राहों में।
सुबह हुई कब शाम हो गई?कुछ ना   लेना-देना था।
रंग-बिरंगे,चन्द खिलौने, लेकर दिवस बिताना था।
माँ का हाथ बँटाना था,ना मन्दिर हमें सजाना।
पढ़ने-लिखने की कौन कहे?खेलों में समय बिताना। 
गिल्ली-डंडा,छुपम-छुपाई,अड्डू ,कंचे या गोली।   दूर-दूर तक चल देती थी,हम सब बच्चों की टोली।।

डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी, नैनीताल, (उत्तराखण्ड)
8171881903

चित्राधारित कविता लेखन

 

चित्राधारित कविता-लेखन---

चित्त-वृत्ति को पावन करता योग सदा ही,
आत्मा को परमात्मा से मिलवाता ये ही,
अन्तर्वाह्य जगत-शुद्धि का मार्ग यही है,
मोक्ष प्राप्त करने का मात्र उपाय यही है।।

योग दिलाए मुक्ति कष्टदायी रोगों से
सद्ज्ञान बढ़ाये, दूर करे सब भोगों से।
योगाभ्यास करो नित,कहते योगगुरू
लोगों से,
जीवन-जीने की कला सिखाएँ योगों से।।

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डाॅ0,श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी,नैनीताल, (उत्तराखण्ड)
8171881903

मुक्त छंद

 

मुक्त-छंद---

स्वर्णाभा छा गई गगन में
हलचल हुई  धरा के मन में
अँगड़ाई ली शीतल-शीतल
मन्द-मन्द मदमस्त पवन में।।

रजनी दौड़ी-दौड़ी छिप गई
दर-दर भटकी हवा बावरी
रश्मि-तीर छोड़े किरणों ने
खिली रोशनी,दिशा जग गई।।

सुमन,सुरभि मदहोश कर गईं
धीरे-से कलियाँ मुसकाईं,
कोमल डाली भी इतराई
अठखेली पत्तों से कर गई।।

धरती का श्रृंगार देख लो
अनुपम परिवर्तन निहार लो
सुबह-सवेरे दृश्य देख लो
स्वर्णाभा का जाल देख लो।।

मन सुन्दर तो जग सुन्दर है
मानव सुन्दरता सँवार लो
अम्बर,धरती,जल,जन-मन में,
स्नेह,प्यार भर दो जन-जन में।।

डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी, नैनीताल, (उत्तराखण्ड)
8171881903
रचना-तिथि----13.102020

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बाल-कविता

 

बाल-कविता-----

दौड़ रही आँगन में पोती
कभी चहकती,कभी फुदकती
गौरैया-सी चूँ-चूँ करती
फुर्र-फुर्र कर दाना चुगती।

तितली देख पकड़ने जाती
उछल-उछल कर,कोशिश करती
कभी भागती,फिर रुक जाती
इधर मचलती,उधर मटकती।

फूलों को भी वो चुन लाती
उनके सारे रंग बताती
देख-देखकर खुश हो जाती
भोला,प्यारा बचपन जीती।

ढेरों बातें खूब बनाती
दादी के संग गाना गाती
किस्से कभी कहानी सुनती
परियों, गुड़ियों में रम जाती।

सारा दिन सबको उलझाती
खेल-कूद कर जब थक जाती
बड़े प्यार से वो सो जाती
सुन्दर सपनों में खो जाती।

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डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखण्ड)
8171881903

 

चित्राधारित कविता लेखन---

पुष्प मुकुट,उर सुमन माल
चन्दन-तिलक रोली,गुलाल।
बिम्ब फल इव अधर लाल।।
अलकावलि लटकत सुघड़ भाल,                   
अनुपम,मधुर छवि कृष्ण-बाल,            
वंशी बजावत नन्द-लाल।।
मन-मोहिनी सुमधुर चाल,
कोमल,गुलाबी,लाल गाल।।

डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखण्ड)
8171881903

गीतिका छन्द

 

14,12=26 मात्राएँ,अन्त-लघु,गुरु 
   गीतिका छंद

सदगुरु-चरण-रज पुण्य से,पाते सभी
जानिए।
लो ज्ञान जितना ले सको,दिव्यता से लीजिए।।
अभिमान तज कर देखिए, मन समर्पित कीजिए।
भ्रम सभी मिट जाएँगे,ज्योतित शिखा को कीजिए।।

परमात्मा से आत्मा का,मिलन जब हो जाएगा।
ब्रह्म का वैभव अलौकिक, रूप अनुपम छाएगा।।
सम्पूर्ण वसुधा के लिए,समदृष्टि कर लीजिए।
घर,सदन,परिवार जैसा,इस धरा को कीजिए।।
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(गुरुवार को गुरु पर अभी-अभी लिखी रचना)

डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखण्ड)
8171881903

बिम्ब-फल इव लाल

 पुष्प मुकुट,उर सुमन माल

चन्दन-तिलक रोली,गुलाल।

बिम्ब फल इव अधर लाल।।

अलकावलि लटकत सुघड़ भाल,                    

अनुपम,मधुर छवि कृष्ण-बाल,             

वंशी बजावत नन्द-लाल।।

मन-मोहिनी सुमधुर चाल,

कोमल,गुलाबी,लाल गाल।।



डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'

हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखण्ड)

8171881903। 

दोहा---

 अति चतुराई छोड़ दो,भोलापन अनमोल।

सीधे-सच्चे प्रेम को, कटुता से मत तोल।।

माँ तो माँ होती है

          माँ तो माँ होती है 


नमन करूँ मैं प्रथम गुरू को

 माँ तो माँ होती है। 

उदर-कष्ट सह जन्म दिया, 

 वो बेशकीमती मोती है।

दायित्वों का बोझ लिए विपदा,पीड़ाएँ ढोती है।

तब भी  काम-काज करती 

जब सारी दुनिया सोती है।

ममता का संसार लिए 

वो बीज,प्यार के बोती है।

अपना सर्वस्व लुटा देती

निज सुख-सपनों को खोती है।

समदरशी वाली आँखों में

पारदर्शिता होती है।

विषम परिस्थिति जब भीआती,

माँ की गोदी होती है। 

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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'

राष्ट्रीय-ध्वज

 सम्माननीय साथियो!

सादर अभिवादन।


मुझे प्रसिद्ध कवि डाॅ0राकेश शर्मा 'राकेश' जी द्वारा काव्य मैराथन #PeetMeNotLeave में भाग लेने हेतु नामित किया गया है। मैं सात दिनों तक अपनी एक रचना पोस्ट करती रहूँगी। इस मैराथन में कविताओं का अनुवाद किया जाएगा और एक रूसी अल्मानक में प्रकाशित किया जाएगा।प्रतिदिन मैं  अपने एक मित्र को ऐसा करने के लिए नामित करूँगी। आज प्रथम दिन केन्द्रीय विद्यालय की पूर्व हिन्दी शिक्षिका कवयित्री श्रीमती सुशीला धस्माना 'मुस्कान' जी से अनुरोध करती हूँ कि आज से सात दिनों तक इस पटल पर एक रचना पोस्ट करेंगी व प्रतिदिन एक कवि को नामित करने का कष्ट करेंगी।


डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत' 

हल्द्वानी,नैनीताल (उत्तराखण्ड) 



इस पटल पर प्रथम दिन की मेरी रचना---


राष्ट्रीय ध्वज 


राष्ट्रीय ध्वज की इच्छा है कि चाहे विषम से विषम परिस्थितियाँ क्यों न आ जाएँ? पर उसे तो लहराना ही पड़ेगा।वो फहर-फहर कर पुनर्निर्माण के लिए प्रेरित करता ही रहेगा।ध्वज राष्ट्र की अखंडता,एकता,स्वतंत्रता व सीमा की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। सुप्त-हृदय जाग्रत करने के लिए, देश-भक्ति-भाव भरने के लिए तिरंगे को फहरना ही होगा।

उपर्युक्त भावों को दर्शाती काव्य-पंक्तियाँ-------


      राष्ट्रीय ध्वज 


मैं भारत का राष्ट्रीय ध्वज हूँ, 

मुझको लहराना ही होगा।

विपदाएँ कैसी भी आएँ,

मुझको फहराना ही होगा।।


आशा की नव-किरण बनूँगा,

नूतन परिवर्तन होगा। 

जोश,उमंग की तरंग बनूँगा,

जीने का साहस होगा।।


बंजर,सूखी धरती को भी,

हरित-क्रांति,हरियाली दूँगा।

आजादी पर मर-मिटने की-

चाहत मुक्त-उड़ान की दूँगा।।


जन-मन को सम्बल दूँगा मैं,

आत्म-शक्ति,ऊर्जा दूँगा।

फहर-फहर कर नील-गगन में,

नभ-सा विस्तृत मंडप दूँगा।।


माना,कुदरत क़हर ढा रही,

भूमंडल में महामारी है।

बाढ़ कहीं,भूकम्प कहीं तो,

भुखमरीऔर लाचारी है।।


परिणाम सुखद जब होते थे,

तब ऊँचा मुझे उठाते थे। 

विपरीत परिस्थिति आई तो,

क्यों पृथक नीति अपनाते हो?


अपनी छाया-तले,देश-हित,

विविध-योजना शुरू करूँगा।

शपथ-पत्र का साक्ष्य बनूँगा,

संगठन-शक्ति को बल दूँगा।।


उठो!सजाओ माँ को फिर से,

सोया पुरुषार्थ, जगा दूँगा।

निर्माण करो फिर-फिर भारत का,

जय-जयकार मचा दूँगा।।


संविधान की-'गौरव-गाथा',

झूम-झूमकर गाऊँगा।

सबसे पहले-'देश-अस्मिता',

ऐसी बिगुल बजाऊँगा।।


बलिदान दिया जिन वीरों ने,

मैं उनकी महिमा गाऊँगा।

मान बढ़ाया,आहुति देकर,

'अमर-ज्योति' जलवाऊँगा।।

मैं 'अमर-ज्योति' जलवाऊँगा।


डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'

हल्द्वानी,नैनीताल (उत्तराखण्ड)

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गुरु-वन्दना

 गुरु-वन्दना---


सद्ज्ञान, परमानन्द दें जो,उन गुरू की वन्दना। 

सत्कर्म,धर्म से जोड़ दें जो उन चरन की अर्चना।

शान्ति का सन्देश लेकर,बुद्धि रूप दिनेश दें।

मूल्य जीवन के बताकर,नीति का उपदेश दें।

वन्दन,नमन उन चरण में,जिनमें बसी दिव्यात्मा।

अज्ञानता का शमन कर,ज्योतित करें जो आत्मा।

परमब्रह्म-प्रकाश से,द्युतिमान अन्तर्मन हुआ।

गुरु-कृपा से मन-नयन खुल,जगत-हित जीवन हुआ।

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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'

मनहर घनाक्षरी--

 मनहर घनाक्षरी ----

8,8,8,7 वर्ण पर यति,अंत में लघु,गुरु।


बादल उमड़ रहे बिजली कड़क रही 

डरकर कोई नहीं बाहर निकलता,

देख खग,मृग,जन,जीव सब थम गए 

छिप गए कोई नहीं डगर पे चलता

मचल-मचल मन-भँवर हवा में उड़े

पगला स्वयं को ही बार-बार छलता।

झूमती पवन देख तन में लहर उठे

कोई नहीं पास देख बस हाथ मलता


डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'

प्रथम-प्रयास,मनहर घनाक्षरी के लिए (समीक्षा-हेतु ) 

 दोहे प्रयास-


परहित पर-उपकार से,जन्म सफल हो जाय। 

ध्यान लगा जो ईश में,भव-सागर तर जाय।।


श्रेष्ठ कर्म,श्रम जो करें,प्रभु पर कर विश्वास।

बदल जाएँ दुर्भाग्य सब,यदि हो सत्य प्रयास।।

- डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'

Wednesday, 26 August 2020

आओ!पर्वत से ऊँचाई ले लें

 आओ!पर्वत सेऊँचाई ले लें,

दिल में सागर-सी गहराई ले लें। 

धरती से सर्वस्व लुटाना सीखें,

मानव हैं मन में मानवता ले लें।


पावन नाम जग में राम  का ही है,

मनभावन स्याम नाम कम नहीं है।

धाम वृन्दावन या धाम अयोध्या, 

बरसाता जीवन में सावन ही है।


डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'

सागर-लहरें

 

सागर-लहरें-----

क्षितिज से निकलकर,      मचलती,थिरकती
जलधि की उमंगें
चली आ रही हैं
         तरंगों का उठना फिर
          उठकर के गिरना,
          वो टकराने तट से
           चली आ रही हैं
उर्मियाँ हैं उदधि की
चमकती,दमकती
  हमें खुशियाँ देने                                       
  चली आ रही हैं
            तन-मन भिगोकर
            किनारों को छूकर
            दे भावों के मोती
             चली जा रही हैं
गरजकर,उछलकर
खजाना लुटाकर
नर्तन-सी करती
चली जा रही हैं
               जहाँ भी निहारूँ
               लहरें ही लहरें हैं
               नयनों में अब तक
               वो लहरा रही हैं ।।

      डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
     रचना-तिथि--18.6.2020

प्रकाश

 

नमन भावों के मोती 🙂👏🏼
दिन-मंगलवार
दिनांक-25.8.2020
विषय-प्रकाश
1.आदि देव पर ही टिकी,जीव-जगत की आश।
बिन उसके ब्रह्माण्ड में, होता नहीं  प्रकाश।।
2.अन्तर्मन ज्योतित रहे,सब ज्योतित हो जाए।
लौ उमंग की जब बढ़े,प्रभु-प्रकाश मिल जाए।।
स्वरचित
डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखंड)

मन की बात

         मन की बात


मन की बातें जिससे कह दें,        क्यों धोखेबाज निकलते हैं?

विश्वास करें जब भी जिसपर,

क्यों वे गद्दार निकलते हैं?


सम्मुख मीठा-मीठा बोलें,

पीछे षड्यन्त्र चलाते हैं।

कुटिल चाल,झूठे वचनों से

अपनों को खूब सताते हैं।।


कुछ चाटुकारिता,छल-बल से

सच कहने में ही अटक रहे।

अपने को सबकुछ समझ रहे,

बस स्वार्थ-लाभ में भटक रहे।।


अच्छे को अच्छा कहने में,            कब,कहाँ बुराई होती है?

यदि करें प्रशंसा औरों की,

 तो नहीं हँसाई होती है।।


टेढ़ा आँगन उसका होता,

जो नाच नहीं कर पाता है।

वो खाली ढोल बजाता है,

आधी गागर छलकाता है।।


मन से,वचनों से,कर्मों से,

दिल में कड़वाहट उचित नहीं।

कथनी-करनी का भेद जानते,

इतने भी हम भ्रमित नहीं।।

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      डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत

Saturday, 6 June 2020

मेकल छंद

मेकल छंद----
1.कैसी मधुर बहार है
धवल-नवल रसधार है
देखो!निकली यामिनी
चिर नूतन श्रृंगार है।

2.ये नन्दन, गोपाल है
गल वैजन्तीमाल है
बाजत रुनझुन पैंजनी
सुन्दर, मनहर चाल है।

3.अलि!राग में,'बहार' ले
    'तान,' स्वर-विस्तार'ले
    आज 'तराना' छेड़ दे
    'सरगम'सरस फुहार ले।

4.सैनिक वीर जवान है
    भारत माँ की शान है
    करता सीमा की रक्षा
   कहता देश महान है।👏🏼👏🏼👏🏼

डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'

सुख-दुख की लहरें

सुख-दुख की लहरें उद्वेलित,
भँवर उठे, सागर भी  तरंगित।
छोटी नाव, गहन है धारा,
नहीं सूझता कोई किनारा।
हे ईश्वर!प्रभु!भगवन्!भोले!
नाव मेरी मँझधार में डोले,
जीवन-नैया पार लगा दे,
सहज किनारा मुझे दिखा दे।।

चित्राधारित कविता

चित्राधारित कविता लेखन संख्या--29

गहरे लाल सिंदूरी रंग ने,
मनमोहक परिदृश्य बनाया।
सजे गुलमौहर डगर किनारे,
बिखरा रंग, कुदरती माया।

ये अद्भुत,नूतन परिवर्तन,
देख-देख मानव भरमाया।
प्रकृति-प्रेमियों के विस्मित-दृग-
उलझ पड़े,मन अति हरषाया।
पंकज, पंक-सलिल में पुष्पित,
सुन्दर, सुरभित और सुगन्धित
हृदय-पटल पर यदि खिल जाए,
सचमुच समाधान मिल जाए।
जीवन-नलिन मुदित यदि हर-पल,
तो कठिनाई, मुश्किल भी हल।
विविध रंग,मन-अंबुज पाए,
खुशियों का शतदल खिल जाए।।

हाला,प्याला, मधुशाला

प्रणाम काव्य-धारा---
दिए गये शब्द---हाला,प्याला,मधुशाला

प्रिय!तुम मुझको आज पिला दो,
प्रेम,प्यार-पूरित प्याला।
बाँह छुड़ाकर क्यों जाते हो?
आज न जाओ मधुशाला।।
हाला पीकर नहीं मिटेगी,
अन्तरमन की ये ज्वाला,
मदिर-मदिर मदमस्त हृदय से,
बुला रही है मधुबाला।।
जीवन है अनमोल,घोल देती है विष,मदिरा,हाला।
रोता है परिवार मगर,
तिल-तिल मरता पीने वाला।।
-----------*******------------
डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी (नैनीताल)उत्तराखंड।

शिखरिनी छंद

शिखरिनी छंद---
1.उदित मंद
पीताभ रंग-संग
  बालचंद

2.गाएँगे फाग
संग होरी,धमार
ध्रुपद राग

3.हैं मजबूर
पैदल मजदूर
मंजिल दूर

4.ये छतनार
है पादप रसाल
नमित भार

5.रे नटखट!
बनवारी, छलिया
जा पनघट

6.राग मधुर
गाएँगे मिलकर
सारंगी पर
    ---------*****------          डाॅ0(श्रीमती)गीता मिश्रा 'गीत'
दोहा-लेखन-



1.सत्य-वचन,अमृत-सदृश, झूठ-वचन विष जान।
जिसकी जैसी समझ है,
वैसा करता पान।।
2.श्रेष्ठ कर्म,श्रम जो करें,प्रभु पर कर विश्वास।
बदल जाएँ दुर्भाग्य सब,यदि हो सत्य प्रयास। ।
3.निर्मल मन दर्पण सदृश,ज्यों का त्यों कह देय।
दम्भ,कपट,छल-भरा मन,सारे सुख हर लेय।।
4.परहित,पर-उपकार से,जन्म सफल हो जाय।
ध्यान लगा जो ईश में,भव-सागर तर जाय।।

डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखंड)

सायली छंद

सायली छंद---
1.   प्रकृति
   सबसे महान
  मत करो दोहन
  निष्ठुर परिवर्तन 
      समाधान 

2.     जलन
     झुलसा देता
      तन-मन-धन
         कर लो
          मनन   

3.      शब्द
      नादमय,ब्रह्ममय
उद्वेलित भाव-सहृदय
     समुचित प्रयोग 
          सार्थक

4.     परिवार
       हो संयुक्त
मिले सहारा परस्पर
    अकेला भ्रमित
    किंकर्तव्यविमूढ़

डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखंड)

सोरठा

सोरठा
1.वसन,घटा सम नील, सौम्य राधिका, गौर तन।नयन गहन द्वय झील, देखि स्याम बेसुध भये।।

2.सुस्मित चितवन रेख, निरख चम्पा सकुचाई।
गन्धराज को देख,खिल गई रजनीगंधा।।

3.इन्द्रधनुष-रंग-सात,विविध रंग, शंकर-धनुष।
अरिदल को दे मात,चाप श्रीराम धरैं जो।।
4.
पश्चिम दिक् कर लाल,भानु अब अस्त हो रहा।
सिंदूरी रँग डाल,उदित कल पूरब होगा।।
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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'

Saturday, 15 February 2020

चन्दा

भारतीय दर्शन में कार्य-कारण भाव की  विस्तृत जानकारी  मिलती है।कार्य है तो कारण भी होगा। चाँदनी है तो चाँद भी होगा। प्रत्येक कार्य का कारण अवश्य होता है। यथार्थ व कल्पना के मिश्रण से उत्पन्न यही भावाभिव्यक्ति छोटी-सी रचना में सन्निहित है------------

            चन्दा

दिखा दो मुझको गगन में चन्दा,
न जाने ओझल कहाँ हुआ है?
सितारे भी  झिलमिला रहे हैं,
घटा से अम्बर घिरा कहाँ है?
चलो-चलें,देखें,ढूँढें चन्दा,
कहीं तो वो जगमगा रहा है?
गिरि,कन्दरा,वन-उपवन या मन में,
जहाँ भी वो खिलखिला रहा है।
सुनो प्रिये!चाँद मन में उतरा,
वहीं ये हलचल मचा रहा है।
गगन से जल में,धरा से मन में,
उतर वहाँ, छिप, चमक रहा है।
षोडश कलाएँ दिखा दीं दिल में,
भावों का सागर उमड़ रहा है।
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डाॅ0(श्रीमती)गीता मिश्रा'गीत'

Tuesday, 28 January 2020

ये कैसा गणतंत्र

देश की  संसद में नागरिकता संशोधन विधेयक पास होते ही विपक्षी दलों ने जनता को  इतना भड़काया व भ्रमित किया कि हमारा प्रजातंत्र सड़कों पर उतर कर सरकारी  सम्पत्ति को ही जलाने लगा।  हिंसा,दंगे,हत्या व आग की लपटों से देश जलने लगा।ऐसे वातावरण में आह!से निकली कुछ  पंक्तियाँ--------
      ये कैसा गणतंत्र?
ये कैसा गणतंत्र हमारा, ये कैसा गणतंत्र?

तोड़-फोड़ कहीं खून-खराबा,
तार-तार इज्जत,मर्यादा।
आगजनी,दंगे-फ़साद में
लिप्त रहे जनतंत्र।।
ये कैसा गणतंत्र हमारा,ये कैसा गणतंत्र?

फाड़ दिया माँ का ही आँचल
जला दिए श्रृंगार,
मातृभूमि पर हमला करना,
अपनों का षडयंत्र।।
ये कैसा गणतंत्र हमारा,ये कैसा गणतंत्र?

अपने ही अपनों को मारें
समझ नहीं, मतिमंद हैं सारे।
ज़हर  घोल कानों में इनके
फूँक दिया विषमंत्र।।
ये कैसा गणतंत्र हमारा, ये कैसा गणतंत्र ?

विस्फोटों से दिल दहल रहा,
सीने छलनी हैं बेशुमार।
अपने ही करते जब प्रहार,
होता है दूषित लोकतंत्र।।
ये कैसा गणतंत्र हमारा  ये कैसा गणतंत्र ?

मिला न अवसर राजतिलक का,
मिला न मौका गद्दी का।
ऐसे नेता भ्रष्ट चलाते,
दाम,दण्ड के यन्त्र।।
ये कैसा गणतंत्र हमारा, ये कैसा गणतंत्र ?

चक्रव्यूह,शतरंज बिछाकर,
जनता को  भरमाते।
फिर कूटनीति से बुरा फँसाते
नेताओं के तन्त्र।।
ये कैसा गणतंत्र हमारा  ये कैसा गणतंत्र ?

अज्ञानी,भोली,मूर्ख प्रजा,
आपस में ही भिड़ जाती है,
लोभी,भोगी नेताओं के
जपती रहती है मंत्र।।
ये कैसा गणतंत्र हमारा,ये कैसा गणतंत्र ?

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डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत'

Thursday, 9 January 2020

चाह

चाह

राष्ट्र की एकता के स्वर बजाकर गीत गाऊँ मैं।
धरा से प्रेम करने की
मधुर सरगम सुनाऊँ मैं।।

देश ही राग,देश आलाप,
देश ही तान सप्त-सुर में।
तराना छेड़ दूँ ऐसा कि
भर दूँ जोश जन-जन में।।


झेलना चाहती मैं, यातनाएँ उन शहीदों की।
जो हँसकर काट देते थे-
'सज़ाए मौत' जीवन की।।


उढ़ाकर ओढ़नी माँ को हरी, धानी या बासंती,
बनाना चाहती हूँ
हर चमन की डाल रसवंती।।


पहनकर केसरी धोती
बनी जो शुद्ध खादी की
झूलना चाहती काँटों भरी
सूली भगत सिंह की।।


उठाकर खड्ग,बरछी,ढाल राणा और रानी के।
मिटाना चाहती अन्याय, शोषण,भेद वसुधा के।।
भुलाकर प्रान्त,भाषा,
रंग की असमानता सारी।
मिलाना चाहती हूँ संस्कृति
चारों दिशाओं की।।


तिरंगा हाथ में ऊँचा उठाकर
शान- से जग में।
यूँ ही बलिदान होना चाहती अपने व़तन पर।।
9.ये भारत है शहीदों का
यहाँ बलिदान वीरों का।
करूँ अर्पण रक्त,तन-मन,
नमन शत-शत कोटि वन्दन।।


-----------डाॅ0 गीता मिश्रा
(राष्ट्र के नाम समर्पित चन्द पंक्तियाँ)

याचना

याचना

ओ सावन-मनभावन मेघा! जन-जन-मन पावन कर दे।
वसुधा के अँचल को जल से, हरा-भरा निर्मल कर दे।।
तू गरज मगर उतना ही गरज, तेरी गर्जन 'जयगान' लगे।

तू बरस यहाँ उतना ही बरस,
धरती को जितनी प्यास लगे।
मत 'फट पड़ना' तू अपनों पर,
जो तेरी राह निहार रहे।
तेरी जलधाराओं से ही,
जो जीवन यहाँ गुजार रहे।।


तेरा विधान'परहित' का है,
अपनी मनमानी मत करना।
हो मन में कितनी उमड़-घुमड़,
सीमा-उल्लंघन ना करना।।


ग़र रौद्र-रूप तेरा होगा,
सब उथल-पुथल मच जाएगी।
आर्त्त-नाद,क्रंन्दन-स्वर से,
धरती कंपित हो जाएगी।।


तेरे तांडव-नर्तन से तो,
हर दिशा यहाँ थर्राएगी।
अतिवृष्टि,बाढ़,भू-कंपन से,
जल-मग्न धरा हो जाएगी।।


याचना यही तुझसे मेरी,
भू का नूतन श्रृंगार रहे।
सम्पूर्ण विश्व के अधरों पर,
नित मन्द,मधुर,मुस्कान रहे।।


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डाॅ0 (श्रीमती) गीता मिश्रा
रचना-तिथि--25.7.2018

तिरंगा


मंगल-गीत

आगत गणतन्त्र-समारोह 2019 के शुभ-अवसर पर विश्व -कल्याण की कामना वाली पूर्व-रचित रचना प्रेषित कर रही हूँ------

मंगल-गीत

मंगल सभी का हो यहाँ
सबके मधुर सम्बन्ध हों,
मैं दे रही दिल से दुआएँ
सब सुखी सम्पन्न हौं।

वर्षभर शुभकामनाओं
के दीये जलते रहें,
हर द्वार पर खुशियों के
बन्दनवार लहराते रहें।
सत्यता की धूप देकर
मन-भवन पावन करें,
दुर्भावनाओं का हवन
सद्भावों का अर्चन करें।

सम्मान, उन्नत ज्ञान का
चन्दन लगा हो भाल में,
संकल्प का हो आचमन
कर्त्तव्य पूजन-काल में।

प्रेम-धुन से शंख-सा
जयघोष गुंजित हो सके,
सुख-शांति के तोरण-कलश
चारों दिशाओं में सजें।

पालने में प्यार से-
बचपन सदा पलता रहे,
यौवन ,युवा का खिल उठे,
सौन्दर्य बिखराता रहे।
जो ज़िन्दगी के अनुभवों
का सार लेकर जी रहे,
उन पूर्वजों के भव्य,
अनुपम ज्ञान की छाया रहे।

अन्त में----
कोई न भूखा हो ज़हाँ में
अन्न,जल,धन पा सकें,
निर्धन भी अब हर हाल में
खुशहाल जीवन जी सकें ।
------ डाॅ0 गीता मिश्रा

'भारतमाता'

26जनवरी 2019, गणतंत्र -दिवस के राष्ट्रीय पावन-पर्व पर भारतमाता के अनुपम सौन्दर्य
को याद करते हुए कुछ पंक्तियाँ लिखीं। हम सब भारतीयों की विचारधारा, भारत माँ के प्रति
सर्वस्व-समर्पण की सदैव बनी रहे। इस आशा के साथ प्रेषित कर रही हूँ रचना--

'भारतमाता'
भारतमाता
मैं,विश्वपटल पर सबसे पावन,
दिव्य भूमि जन-जन-मन-भावन,
निर्झर,नदियों के संगम में,
मधुर-मधुर-मृदु गीत सुनाती।
मैं भारतमाता कहलाती।

है रूप नवल,श्रृंगार नवल,
निज बच्चों पर अनुराग धवल,
मैं नीर-नेह-नयनों में ले,
सिंचित कण-कण को करवाती।
मैं भारतमाता कहलाती।

विमल,श्वेत हिमवान है मुझमें,
गहन-सघन वन-प्रांत है मुझमें,
उमड़ रहा रत्नाकर देखो,
मचल-मचल नदियाँ लहरातीं।
मैं भारतमाता कहलाती।

मैं, सरल-सहज भावों वाली,
माधुर्य, मनोहर गुणवाली,
रस,छंद,कला से सजी-धजी,
कुदरत की रचना मदमाती।
मैं भारतमाता कहलाती।

फल-फूलों से लदे हैं टीले,
रंग-बिरंगे बड़े रसीले,
मेरे खेतों की हरियाली,
अनुपम सुन्दरता बिखराती।
मैं भारतमाता कहलाती।

मैं भोले - से बचपन में हूँ,
बाग-बगीचे, उपवन में हूँ,
मैं,नील,हरित,पीताम्बर वाली
थिरक-थिरक दिल धड़काती।
मैं भारतमाता कहलाती।

रंगीन तितलियाँ मँडरातीं,
सुरभित - सुमनों पर इतरातीं,
जब विहग-वृन्द कलरव करते,
तब मन्द-मन्द मैं मुस्काती।
मैं भारतमाता कहलाती।।

रचना-तिथि----26.1.2019
डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा।

सखि-कथन

वसन्त-ऋतु के आगमन पर एक सखि अपनी प्रिय सहेली से कहती है--'एक काले भ्रमर ने गुनगुनाकर वसन्त-आगमन का सन्देश दिया और उसके रूप-सौन्दर्य का ऐसा वर्णन किया कि मेरा तन-मन भी वासन्ती हो गया।
वसन्त-आगमन
---------------------

सखि-कथन----
सखि!स्याम-मधुप,आ,पास मेरे,
गुन-गुन करता मँडराने लगा।
फिर कंत-वसंत के आवन का,
संदेशा रसिक! सुनाने लगा।।

भ्रमर-कथन----
सुकुमार वसंत का रूप नवल,
है पूर्ण चन्द्र,चाँदनी धवल।
मौक्तिक तारे झिलमिला रहे
पर्वत,घाटी खिलखिला रहे।।

अब हुई सुबह,सिंदूरी-सी ,
हरियाली,हरित मखमली-सी,
पीले -पीले खेतों ने कर दी,
वासन्ती काया,वसुधा की।।

हैं झूम रहे सब पीत-सुमन,
प्यासे भँवरे करते गुंजन,
हौले-हौले मृदु गीत सुना,
पालना झुलाती मस्त-पवन।।

कलियाँ भी लुक-छिप झाँक रहीं
खिलने का बहाना ढूँढ रहीं।
रंगीन तितलियाँ देख-देख,
बचपन का आनन्द उठा रहीं।।

फूलों से सजी, हर डाल लदी,
वन-उपवन मधुर बयार चली।
सब चंचल हैं-सर,ताल,नदी,
निर्झर-जल-सरस फुहार चली।।

लो उठी हूक! कोयल बोली,
बावली! अभी तक है भोली।
'कुहुक' रही पंचम स्वर में,
मतवाली अमुआ पर डोली।।
सखि-कथन---
रस,रूप,गन्ध का लोभी अलि!
उड़ चला,जिधर थे सुमन-वृन्द,
मेरा मन वासन्ती करके,
पी रहा वहाँ,सुमधुर-मकरन्द।।

------------××××××××------------
डाॅ0(श्रीमती)गीता मिश्रा
रचना-तिथि---6.2.2019

हिन्द-सेना की चेतावनी

कश्मीरी भटके युवकों को
हिन्द-सेना की चेतावनी---

कश्मीरी छद्मी युवको सुनलो!
छल-बल करना बन्द करो,
भारत के अँचल में पलकर,
अब, अरि-बल बनना बन्द करो।।

कर सचेत,अनगिनत बार,
तुमको समझाया बार-बार।
हमने मानवता के नाते,
सुविधाएँ दे दीं बेशुमार।।

तुम डंक मार,ज़हरीले निकले,
घर में फ़न फैलाए निकले
आॅस्तीन का साँप निकले,
विषधर! खूब विषैले निकले।।
खूँखार बने,गद्दार बने,
रुपयों के आगे भटक गए।
हाथों में प्रस्तर उठा-उठा,
निज सेना पर ही पटक गए।।

धिक्कार है उस नादानी को!
जो अपनों पर ही वार करे।
धिक्कार है भ्रमित जवानी को!
जो माँ का ही संहार करे।।

हम सेनानी,हिन्दुस्तानी,
रणवबीर, बाँकुरे,बलिदानी।
भारत-माँ की रक्षा में हरदम,
हँस -हँसकर देंगे कुर्बानी ।।
ज़िन्दा हैं जब तक हम प्रहरी,
अस्त्रों से दागेंगे गोली।
कश्मीर, हिन्द की है धरती
मारेंगे गीदड़ की टोली।।

शत्रू की जंगी चालों को
घातों को,सभी कुचालों को,
हम तहस-नहस कर डालेंगे,
हम ध्वस्त-पस्त कर डालेंगे।।

हुँकारेंगे , ललकारेंगे,
चुन-चुनकर अरि को मारेंगे।
हम वीर-धीर सेनानी हैं,
डंके की चोट सुनाएँगे।।

बहुत कर लिया रक्तपात,
अब भस्म तुम्हें हम कर देंगे।
विजयी भारत में घूम-घूम,
नारा 'जयहिन्द' लगाएँगे।।

इस स्वर्ग -समान पुनीत धरा पर,
हिन्द-तिरंगा ही फहरेगा।
नभ तक झंकृत होगा 'जयहिन्द,
'बन्देमातरम्' गूँजेगा।।
बन्देमातरम्' गूँजेगा।।
------***--------

रचना-तिथि--22-2-2019
डाॅ0 (श्रीमती) गीता मिश्रा

वासन्ती महारास

होलिकोत्सव पर समर्पित चन्द पंक्तियाँ-----
मानवीकरण द्वारा होली,दिशा,धरा,पवन का, वसन्त के साथ होली खेलने का चित्रण है ।अन्त में होली तथा महारास की धूम सब कृष्णमय हो गई।'श्रीकृष्णःशरणम् मम्'।

वासन्ती महारास
----------------------

ऋतुराज 'वसंत' उमंग लिए
मदमस्त 'पवन' संग झूम रहे,
यह देख जली,मचली 'होली'
लेकर आई कुछ रंग नए।।

पिचकारी रंग-भरी मारी,
कोमल 'वसंत' तिलमिला गए।
जब रंग गुलाल मला गालों पर,
प्रिय 'वसंत' खिलखिला गए।।

फिर झूम-झूम,कुछ घूम-घूम,
कुछ महक-महक आ गई 'दिशा'
'होली-वसन्त' का मिलन देख,
अकुलाई कुछ बलखाई 'दिशा'।।

मुरली,मृदंग,ढप, ढोल बजे,
शहनाई बजी यमुना-तीरे।
रच गया रास,छिड़ गया फाग,
रंग-स्याम चढ़ा धीरे-धीरे ।।

दुल्हन-सा सब श्रृंगार किए,
'धरती' भी अब रंगीन हुई।
फिर महारास की धूम मची,
'कान्हा' में ही तल्लीन हुई।।

ये 'पिय-वसंत' ही 'कान्हा' है,
वासन्ती-रंग 'व्रजबाला है'।
होलिका पवन' संग'धरा','दिशा',
हर गोपी देवी-बाला है।।

आओ!हम भी सप्त रंगों से,
होली का त्यौहार मनाएँ।
सुमनों की बौछार करें,
सब 'कृष्ण'-प्रेम में खो जाएँ।।

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डाॅ0(श्रीमती)गीता मिश्रा
रचना-तिथि-15.3.2019

सावन-संगीत

सावन-माह की प्रारम्भिक बरसात देख हृदय-घट में भाव कुछ इस तरह उमड़ पड़े----
सावन-संगीत
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सुनो प्रिय! सावन का संगीत।
मधुर-मन-भावन वाला गीत ।।

'मेघ-राग' सावन ने गाया,
बादल उमड़ पड़े,
मचल-मचल फिर घुमड़, बरस कर,
धरती से मिल गये।
निहारो मिलन, मेरे मनमीत!
प्रकृति की दिव्य,निराली प्रीत।।

सुनो प्रिय! सावन का संगीत।
मधुर-मन-भावन वाला गीत।।

'आरोह-अवरोह','पकड़' सुनाकर
करे राग-विस्तार,
गति बिलम्ब -'आलाप'-आलापे,
तानों की झनकार।।
नाथ!ये आत्मिक-सुख-संगीत।
पारलौकिक,आध्यात्मिक गीत।।

सुनो प्रिय! सावन का संगीत।।
मधुर-मन-भावन वाला गीत।।
'होरी','ध्रुपद','धमार' सुनाता,
छेड़े कभी 'तराने'।
कभी 'ठुमरियाँ','थाट','मुरकियाँ'
लेता उलझी 'तानें'।।
मेरे अन्तर्मन! अनहद मीत!
'नाद'-मय-समय न जाए बीत।।

सुनो प्रिय! सावन का संगीत।
मधुर-मन-भावन वाला गीत।।

पहले रिमझिम पड़ीं फुहारें,
फिर बरसा अमृत-सा पानी।
सावन-रूप- झमाझम देखा,
धरती ने की मनमानी ।।
प्राण!सच्ची है इनकी प्रीत।
हरित छवि,दिव्य रूप,भव-मीत।।

सुनो प्रिय! सावन का संगीत।
मधुर-मन-भावन वाला गीत।।

सूख गए थे सभी स्रोत-जल,
विपदाएँ भी बरसी थीं।
धूप,तपन,लू,गर्मी से,
सारी धरती झुलसी थी।
सजन!दुख-सुख जगती की रीत,
अन्ततः सावन की ही जीत।।

सुनो प्रिय! सावन का संगीत।
मधुर-मन-भावन वाला गीत।।
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डाॅ0 (श्रीमती)गीता मिश्रा
25.6.2019

तिरंगे वाली राखी

सन् 2019 में राखी व राष्ट्रीय पर्व पन्द्रह अगस्त के, साथ-साथ आगमन पर,
सैनिकों की अंतरंग इच्छा को कविता के रूप में कुछ इस तरह लिखने का प्रयास किया।आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में-----

तिरंगे वाली राखी

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हम रक्षक हैं सीमाओं के,
प्रहरी हिन्दुस्तान के ।
बहिनों!राखी हमें भेजना,
हम बाँधेंगे शान से।।

यूँ तो दिव्य-दुलार तुम्हारा,
हमें सदा मिलता रहता।
छोटी-बड़ी सभी बहिनों का,
प्यार कलाई पर सजता।।

पर अबकी बार तिरंगे वाली,
राखी सैनिक पहनेंगे।
भाई-बहिन के स्नेह में डूबा
देश-प्रेम दर्शाएँगे ।।

आजादी के पुण्य-पर्व पर,
पहन इसे गर्वित होंगे।
मिला कदम समवेत स्वरों में
आगे बढ़ते जाएँगे।।

सौभाग्य जगा है भारत का,
दुर्भाग्य भगा है भारत का।
खंडित कश्मीरी हिस्से को,
भारत का अंग बनाएँगे ।।

ऐसी राखी भेजो बहिनों!
बस हिन्द तिरंगा ही दमके।
एक तिरंगा हाथों पर तो
एक कलाई पर चमके।।

अमर रहे 'पन्द्रह अगस्त',
नभ-भेदी बिगुल बजाएँगे।
राखी वाले हाथों से ही,
सुनो! तिरंगा फहराएँगे।।

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---- डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत'
रचना-तिथि----8.8.2019

मैं हिन्दी हूँ

हिन्दी सप्ताह,हिन्दी दिवस,हिन्दी पखवाड़ा और हिन्दी माह।हर साल की तरह सितम्बर माह में तरह-तरह के आयोजन हर वर्ष होते आ रहे हैं परन्तु हिन्दी की स्थिति आज भी वैसी ही दयनीय है।वर्ष 2000 में जो कविता लिखी थी आज भी वो
प्रासंगिक लगती है क्योंकि हिन्दी को आज भी वो सम्मान नहीं मिल पाया जिसकी वो अधिकारी है। कविता में हिन्दी
की दयनीय स्थिति की संगति
सीताजी से बैठाई है।
मैं हिन्दी हूँ

वर्षों से शोषित
अधिकार -वंचिता
निष्कासितअपनों से
परित्यक्ता'सीता'-सी
मैं हिंदी हूँ।
अंग्रेज़ियत की रावण-भुजा द्वारा घसीटी जाती--अपहृत नारी-सी,चीखती-चिल्लाती,
रोती विलखती
सिमट कर, देहरी पर
लज्जा बचाती,
मैं हिन्दी हूँ।
अपने ही देश में,
अपनों के बीच में,
शंकित दृष्टियों में,
उठती उँगलियों में
अपमानित,लज्जित
अग्नि-परीक्षा देकर
मर्यादा बचाती,
मैं हिंदी हूँ।
और अब शरणांगतवत्सल
वाल्मीकि-सदृश
चन्द लोगों के मन-आश्रम में अस्मिता छिपाए,
संस्कृति बचाए
हिन्दुस्तान की 'आत्मा'
हिन्द का 'प्राण'-
स्व-अस्तित्व को, पालती-पोषती,
मैं हिन्दी हूँ।
घोषित 'रानी','राजरानी'
कागजी सिंहासन की,
लेकिन
एकाकी,विरह-दग्धा,
शोक से पागल,
विषमताओं से घिरी,
फिर भी आशान्वित -
आँग्लभाषा से अधिक
सम्मान पाने को तरसती
मैं हिन्दी हूँ।

-------------------
डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत'
प्रकाशित--स्मारिका -सहस्राब्दी अखिल भारतीय राजभाषा संगोष्ठी,भुवनेश्वर 18.अक्टूबर 2000।

आकाश मन का चाहती हूँ

सांसारिक बन्धनों में व्यक्ति इस तरह फँसा हुआ है कि चाहते हुए भी उससे बाहर निकल नहीं पा रहा है।प्रकृति की गोद में ही पल रहा है पर उसकी महत्ता से अनभिज्ञ है।उसका सौन्दर्य-लाभ तक नही ले पा रहा है।मन की इसी धारणा ने चन्द पंक्तियों का सृजन किया----------

आकाश मन का चाहती हूँ

1.मोह-माया-जाल से अब दूर जाना चाहती हूँ,
मुक्त होकर उड़ सकूँ, आकाश मन का चाहती हूँ।।

2.कुदरती रंगों में रँगना और सँवरना चाहती हूँ,
उदित रवि की लालिमा से,मैं उलझना चाहती हूँ।।

3.मधुर किसलय,सुमन-सौरभ-संग खिलना चाहती हूँ,
चटखती,इतराती कलियाँ देख,हँसना चाहती हूँ।।

4.ओस की मौक्तिक चमक से खेलना मैं चाहती हूँ,
झूमती फसलों में लहराकर, मचलना चाहती हूँ।।

5.स्वर मिला,खग-वृन्द-संग,सरगम सुनाना चाहती हूँ,
पक्षियों के झुँड में,मैं भी फुदकना चाहती हूँ।।

6.पंचम स्वरों की मल्लिका का गीत सुनना चाहती हूँ,
डाल मैं छिप,पिक-सदृश,मैं भी कुहुकना चाहती हूँ।।

7.प्रकृति का अनुपम खजाना, लूटना मैं चाहती हूँ,
चुपचाप,लुक-छिप,दिव्य,अद्भुत लाभ लेना चाहती हूँ।।

-----डाॅo गीता मिश्रा 'गीत'
रचना-तिथि---7.10.2019

सुहानी-सुबह


20-12-16 में लिखी पंक्तियाँ आज प्रेषित कर रही हूँ।प्रातःकाल भ्रमण के दौरान, उदय होते सूर्य के साथ-साथ आये परिवर्तन को देखकर कुछ लिखे बिना नहीं रह सकी।

सुहानी-सुबह
1.रंग में अपने रंग दिया,
रवि ने, सुबह से ही गगन।
देख नभ की अरुणिमा,
हो गई दिशाएँ भी मगन।।

2.लालिमा भी प्यार से,
उन बादलों पर छा गई थी।
दूर अपनों से छिटक,
जिनमें उदासी आ गई थी।।

3.जागते, फिर फड़फड़ाते,
पक्षियों के पंख, तरु पर।
करने लगे कलरव कहीं,
क्रन्दन कहीं, हर डाल पर।।

4.गुनगुनाते भँवर,
तितली खोलती हैं पंख कोमल।
डाल में छिप, गा रही,
पंचम सुरों में स्याम-कोयल।।

5.फूल-सी माँ खिलखिला कर,
खोलती घर,द्वार,आँगन,
फिर चलीं,निज बाल-कलियों
को सुनाने गीत-गायन।।

6.वन,बाग,उपवन,वाटिका,
गुंजित हुईं सब घाटियाँ
वीणा बजाकर पवन ने,
झंकृत करीं सब वादियाँ।।

7.छिड़ गया संगीत अनुपम,
इस धरा से उस गगन तक।
चल पड़ा जीवन अनोखा,
सुरमयीसुबह से, शाम तक।।

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‐--डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत'

धुँध वाली धरती

आजकल कहीं बर्फ की चादर है तो कहीं कोहरे की।
धरती पर कोहरा छाया देखकर कुछ यथार्थ व काल्पनिक भाव इस तरह जगे कि सूर्य व धरा का मानवीकरण कर बैठे।
आभारी रहूँगी आपके वाचन की।

धुँध वाली धरती


धुंध-चादर,हरित-तन पर,
करके अवगुंठन-वदन पर
सरसराती,मदमदाती,
धवल नभ तक छिपछिपाती,
धरती मानो पग बढ़ाये,
चल पड़ी सूरज से मिलने।।

भीगा-भीगा श्वेत अम्बर,
झीना-झीना पट पहनकर,
प्रेम-पूरित गीत गाती-
हौले-हौले गुनगुनाकर,
धरती जैसे पग बढ़ाये-
चल पड़ी सूरज से मिलने।।

पथ में उलझी अटपटी-सी,
सहमी-सहमी,अटकती-सी,
सोचती, पलकें झुकाती,
जानें क्यों फिर-फिर लजाती?
धरती अब भी पग बढ़ाये,
चल रही सूरज से मिलने।।

रवि को नभ पर ही मनाने,
साथ हँसने-मुस्कुराने,
गर्म किरणों में मचलकर,
अनावरण अपना करवाने,
धरती सचमुच पग बढ़ाये,
चल रही सूरज से मिलने।।

धुंध में लिपटी धरा को-
देख, पीड़ा-मुक्त करने,
डालकर निज कर-निकर,
रवि भी चला कोहरा हटाने।।

अब ये दोनों पग बढ़ाये,
चल रहे आपस में मिलने।।

देखकर परिदृश्य अनुपम,
विश्व-जन प्रमुदित हुए,
अद्भुत,अलौकिक मिलन से,
सब काम भूतल पर हुए।।

आओ!चलें हम भी सदा-
सहयोग से सद्भाव से,
वसुधा-रवि जैसे मिले,
परमार्थ-हित नि:स्वार्थ से।।


डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत'
रचना-तिथि---28.12.19
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नव- वर्ष(जागरण-गीत)

नव- वर्ष(जागरण-गीत)
नव-वर्ष आ गया है,
नींद से जगा रहा।
देश-प्रेमियों को फिर,
नया सबक़ सिखा रहा।
ये चेतना का वर्ष हो,
ये जागृति का वर्ष हो।
आतंक के विरुद्ध,
जंग जीतने का वर्ष हो।
प्रचंड रौद्र रूप हौं,
जीत के ही गीत हौं।
जो दस को मारकर मिटें,
ऐसे देश-वीर हौं।
रक्त में उबाल हो,
नसों में तेज धार हो।
जान देने के ज़ुनून
की बड़ी कतार हो। '


'पंचजन्य' फिर बजे,
दिशाएँ गूँजने लगें।
'गांडीव' कान तक तने,
डंका युद्ध का बजे।
हुँकार से,दहाड़ से,
खड्ग के प्रहार से।
आतंकी मुँड काट दो
जो 'पाक' में ही जा गिरें
बन्दूक से भी दनदनाती
गोलियाँ निकल पड़ें।

निशाना तोप से लगे,
गगन से बम बरस पड़ें।
माँ को छूने,छीनने की
'पाक' -चाल नष्ट हो।
कश्मीरवासियों को ओह!
अब न कोई कष्ट हो।
तैयार पूरा देश हो,
लहू में पूरा जोश हो।

उठो,बढ़ो,मरो -मिटो
आतंकियों पे रोष हो।
सत्य की विजय लिए,
'तिरंगा' फरफराता हो।
आतंक का सफाया देख,
'हिन्द' लहलहाता हो।'

--डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा (1-1-2017)

  सुहानी-सुबह             कविता 1. रँग में अपने रंग दिया, रवि ने सुबह से ही गगन। देख नभ की अरुणिमा को, चारों दिशाएँ भी मगन।। 2.लालिमा भी प्य...