[27/10, 16:22] डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत': सन्तोष-भाव पर रचना---
विधि का लिखा जो भी मिला सन्तोष होना चाहिए।
रूप,रंग,शरीर-सौष्ठव,संतति,धन-सम्पदा,
प्रभु-कृपा से जो मिले सन्तोष होना चाहिए।
पद-प्रतिष्ठा,मान-निन्दा,लाभ-हानि,सुख-आपदा,
है परम दानी देवता,संतोष होना चाहिए।।
सत्य है,शिव भी वही,पावन सदा,है सुन्दरम्,
मिलता वही जो भाग्य में सन्तोष होना चाहिए।
कर भरोसा विश्व-गुरु पर,जिसने भेजा है धरा पर।
कर्म-रत तन, धर्म में मन, संतोष होना चाहिए।।
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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखण्ड)
[27/10, 16:25] डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत': प्रणाम काव्य-धारा---
दिए गये शब्द---हाला,प्याला,मधुशाला
प्रिय!तुम मुझको आज पिला दो,
प्रेम,प्यार-पूरित प्याला।
बाँह छुड़ाकर क्यों जाते हो?
आज न जाओ मधुशाला।।
हाला पीकर नहीं मिटेगी,
अन्तरमन की ये ज्वाला,
मदिर-मदिर मदमस्त हृदय से,
बुला रही है मधुबाला।।
जीवन है अनमोल,घोल देती है विष,मदिरा,हाला।
रोता है परिवार मगर,
तिल-तिल मरता पीने वाला।।
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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी (नैनीताल)उत्तराखंड।
[27/10, 16:28] डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत': सोरठा
1.वसन,घटा सम नील, सौम्य राधिका, गौर तन।नयन गहन द्वय झील, देखि स्याम बेसुध भये।।
2.सुस्मित चितवन रेख, निरख चम्पा सकुचाई।
गन्धराज को देख,खिल गई रजनीगंधा।।
3.इन्द्रधनुष-रंग-सात,विविध रंग, शंकर-धनुष।
अरिदल को दे मात,चाप श्रीराम धरैं जो।।
4.
पश्चिम दिक् कर लाल,भानु अब अस्त हो रहा।
सिंदूरी रँग डाल,उदित कल पूरब होगा।।
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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
[18/11, 08:26] डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत': ताटंक छंद---मात्रा--30।16,14पर यति।तुकान्त-समचरण।अन्त में तीन गुरु।
याद आ रहा हमें बचपना,बीत गया जो राहों में।
छोटे-छोटे पग धरते थे,घर,गलियों,दो राहों में।
सुबह हुई कब शाम हो गई?कुछ कब लेना-देना था।
रंग-बिरंगे,चन्द खिलौने, लेकर दिवस बिताना था।
घर का काम न करना पड़ता ,मन्दिर नहीं सजाना था।
पढ़ने-लिखने में खेल-खेल,हमको समय बिताना था।
गिल्ली-डंडा,छुपम-छुपाई,अड्डू ,कंचे या गोली। दूर-दूर तक चल देती थी,हम सब बच्चों की टोली।।
डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी, नैनीताल, (उत्तराखण्ड)
8171881903।
