सागर-लहरें-----
क्षितिज से निकलकर, मचलती,थिरकती
जलधि की उमंगें
चली आ रही हैं
तरंगों का उठना फिर
उठकर के गिरना,
वो टकराने तट से
चली आ रही हैं
उर्मियाँ हैं उदधि की
चमकती,दमकती
हमें खुशियाँ देने
चली आ रही हैं
तन-मन भिगोकर
किनारों को छूकर
दे भावों के मोती
चली जा रही हैं
गरजकर,उछलकर
खजाना लुटाकर
नर्तन-सी करती
चली जा रही हैं
जहाँ भी निहारूँ
लहरें ही लहरें हैं
नयनों में अब तक
वो लहरा रही हैं ।।
डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
रचना-तिथि--18.6.2020
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