Monday, 4 March 2024

 सुहानी-सुबह

           कविता

1. रँग में अपने रंग दिया,

रवि ने सुबह से ही गगन।

देख नभ की अरुणिमा को,

चारों दिशाएँ भी मगन।।


2.लालिमा भी प्यार से,

   उन बादलों पर छा गई थी।

   दूर अपनों से छिटक,

  जिनमें उदासीआ गई थी।।


3.जागते फिर फड़फड़ाते,

 पक्षियों के पंख तरु पर।

 करने लगे कलरव कहीं,

 क्रन्दन फुदककर डाल पर।।


4.गुनगुनाते भँवर,तितली-

  खोलती हैं पंख कोमल।

  डाल में छिप गा रही,

 पंचम सुरों में कुहुक कोयल।।


5.फूल-सी माँ खिलखिलाकर,

   खोलतीं घर द्वार आँगन।

  फिर चलीं निज बाल-कलियों 

   को सुनाने गीत-गायन।।


6.वन,बाग,उपवन,वाटिका,

    गुंजित हुईं सब घाटियाँ

   वीणा बजाकर पवन ने,

    झंकृत करीं सब वादियाँ।।


7.छिड़ गया संगीत अनुपम,

  इस धरा से उस गगन तक।

   चल पड़ा जीवन अनोखा,

  सुरमयी सुबह से शाम तक।।


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    डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत'


 गीता छंद---मात्रा भार 14  12=26


अधरोष्ठ द्वय सरसिज सदृश, कोमल चटख रक्ताभ।

कटि करधनी झिलमिलाती,

रुनझुन वलय श्वेताभ।

स्याम-तन पर पीत अम्बर ,

ज्यों नील सर पीताभ।

कमनीय अद्भुत् कृष्ण छवि,

 लोचन जलज नीलाभ।।


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    डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत'


 हंस दोहा -14 गुरु20 लघु


नैतिकता पल्लवित हो,लिए पुरातन कर्म,

सदाचार पुष्पित करे,सत्य सनातन धर्म।।


- डॉ० गीता मिश्रा 'गीत'


Saturday, 24 February 2024

 दोहे - कलयुगी भटका मानव   


अकर्मण्य है आलसी,माँगे छप्पन भोग।

केवल अपना 1 ध्यान है,तब भी लगते रोग।।


जीवन में भटके सदा,घर से जाता भाग।

पर नारी को मानता,अपनी लगती नाग।।


कथनी करनी हैअलग,छल बल हैं हथियार।

रख घमण्ड धनराशि का,लड़ने को तैयार।।


शतरंजी चालें चले, गिरी हुई है सोच।

बात-बात पर झटकता,कब आएगी लोच।।


मीठी बातों में फँसा,कर देता मजबूर।

निज उल्लू सीधा करे,फिर कर देता दूर।।


जाल बिछाकर फाँसता,छिपकर करता वार।

ऐसा मानव कलयुगी,बना धरा पर भार।।


डॉ०श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'


 दोहा -

नहीं चाहते अधर भी, निकलें घट के बोल।

मुखरित होते ही कहीं, खुल जाये ना पोल।।


डॉ० गीता मिश्रा 'गीत'


 माँ तो बस माँ होती है 


नमन करूँ मैं प्रथम गुरू को माँ तो बस माँ होती है। 

उदर-कष्ट सह जन्म दिया,वो बेशकीमती मोती है।

दायित्वों का बोझ लिए विपदा, पीड़ाएँ ढोती है।

तब भी काम-काज करती जब सारी दुनिया सोती है।


ममता का संसार लिए वो बीज,प्यार के बोती है।

निज सर्वस्व लुटा देती, सुख-सपने अपने खोती है।

समदरशी वालीआँखों में पारदर्शिता होती है।

विषम परिस्थिति जब भी आती,

माँ की गोदी होती है। 

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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'


 शरद-पूर्णिमा-


पूर्णेन्दु गगने शोभितम्,शीतल मधुरतम् दिव्यतम्।  

उज्ज्वल दिगन्त सुधवलतम,

उत्तुङ्गजल मनमोहितम।



डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत' 


  सुहानी-सुबह             कविता 1. रँग में अपने रंग दिया, रवि ने सुबह से ही गगन। देख नभ की अरुणिमा को, चारों दिशाएँ भी मगन।। 2.लालिमा भी प्य...