Wednesday, 2 December 2020

सन्तोषं भाव पर रचना

 

[27/10, 16:22] डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत': सन्तोष-भाव पर रचना---

विधि का लिखा जो भी मिला सन्तोष होना चाहिए।

रूप,रंग,शरीर-सौष्ठव,संतति,धन-सम्पदा,
प्रभु-कृपा से जो मिले सन्तोष होना चाहिए।
पद-प्रतिष्ठा,मान-निन्दा,लाभ-हानि,सुख-आपदा,
है परम दानी देवता,संतोष होना चाहिए।।
सत्य है,शिव भी वही,पावन सदा,है सुन्दरम्,
मिलता वही जो भाग्य में सन्तोष होना चाहिए।
कर भरोसा विश्व-गुरु पर,जिसने भेजा है धरा पर।
कर्म-रत तन, धर्म में मन, संतोष होना चाहिए।।
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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखण्ड)
[27/10, 16:25] डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत': प्रणाम काव्य-धारा---
दिए गये शब्द---हाला,प्याला,मधुशाला

प्रिय!तुम मुझको आज पिला दो,
प्रेम,प्यार-पूरित प्याला।
बाँह छुड़ाकर क्यों जाते हो?
आज न जाओ मधुशाला।।
हाला पीकर नहीं मिटेगी,
अन्तरमन की ये ज्वाला,
मदिर-मदिर मदमस्त हृदय से,
बुला रही है मधुबाला।।
जीवन है अनमोल,घोल देती है विष,मदिरा,हाला।
रोता है परिवार मगर,
तिल-तिल मरता पीने वाला।।
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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी (नैनीताल)उत्तराखंड।
[27/10, 16:28] डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत': सोरठा
1.वसन,घटा सम नील, सौम्य राधिका, गौर तन।नयन गहन द्वय झील, देखि स्याम बेसुध भये।।

2.सुस्मित चितवन रेख, निरख चम्पा सकुचाई।
गन्धराज को देख,खिल गई रजनीगंधा।।

3.इन्द्रधनुष-रंग-सात,विविध रंग, शंकर-धनुष।
अरिदल को दे मात,चाप श्रीराम धरैं जो।।
4.
पश्चिम दिक् कर लाल,भानु अब अस्त हो रहा।
सिंदूरी रँग डाल,उदित कल पूरब होगा।।
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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
[18/11, 08:26] डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत': ताटंक छंद---मात्रा--30।16,14पर यति।तुकान्त-समचरण।अन्त में तीन गुरु।

याद आ रहा हमें बचपना,बीत गया जो राहों में।
छोटे-छोटे पग धरते थे,घर,गलियों,दो राहों में।
सुबह हुई कब शाम हो गई?कुछ कब लेना-देना था।
रंग-बिरंगे,चन्द खिलौने, लेकर दिवस बिताना था।
घर का काम न करना पड़ता ,मन्दिर नहीं सजाना था।
पढ़ने-लिखने  में खेल-खेल,हमको समय बिताना था।
गिल्ली-डंडा,छुपम-छुपाई,अड्डू ,कंचे या गोली।                         दूर-दूर तक चल देती थी,हम सब बच्चों की टोली।।

डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी, नैनीताल, (उत्तराखण्ड)
8171881903

नवाक्षरावृत्ति

 

नवाक्षरावृत्ति----211-122-122

माँ मधुर वीणा दिखा दो,
राग दरबारी सिखा दो।

गान अपना बोल दो माँ,
तान अपनी  खोल दो माँ।

गीत सबको प्रीत देगा,
राग मन को जीत लेगा।

वेद तुमने ही रचाए,
भेद सबसे ही छिपाए।

हो नमन पद्मासिनी का,
हो भजन हँसासिनी का।।

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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखण्ड)

मनहर घनाक्षरी

  

मनहर घनाक्षरी---8 8 8 7समीक्षार्थ

                                             उषा ने चलाए बान,धरती में आई

जान,

ओस ने बचाए प्रान, लहराए धान हैं।

सौरभ-सुमन-संग, पवन ने भरे रंग, हौले-हौले छाई अंग,बावरी अनंग है।।

घूँघट भी खोल रही,नथनी भी डोल रही,

पायल भी बोल रही, प्रेम-रस घोलती।

मदिर-मदिर चाल,बिंदिया सजी है भाल,

आनन्द से लाल गाल,चली डोरे डालती।

मनुज भ्रमित हुए,निरख चकित हुए 

मस्तक नमित हुए,खिली मधुमालती।

रातरानी छिप गई,चम्पा तो महक गई,

कलियाँ चटख गईं,जिन्हें उषा पालती।।

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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत' 

हल्द्वानी,नैनीताल (उत्तराखण्ड) 

 


चित्राधारित कविता लेखन

 तन-मन-धन सब छोड़ के मीरा, कान्हा में ही समा रही।

मधुर पदों, भजनों,गीतों में एकतारा को बजा रही।।


डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'

हल्द्वानी,नैनीताल (उत्तराखण्ड) 


चित्राधारित कविता लेखन

 छवि निरखत,बाँकी चितवन कर गौरा मोह रही भोले को।

लास-नृत्य करते-करते शिव देख रहे जगदम्बे को।

ता थेइ थेइ तत् थाप पगों से,रचें अंग-मुद्राओं को।

देख मुदित हैं शिव-शंङ्कर,गिरिजा की काम-कलाओं को।।


डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'

हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखण्ड) 

हास्य-व्यंग्य दोहे----

 हास्य-व्यंग्य---दोहेहास्य-व्यंग्य---दोहे


कवि,लेखक जितने मिले,सबका बुरा है हाल।

आँखों में चश्मा चढ़ा,पिचक रहे हैं गाल।।

साथियो!----

अर्द्धरात्रि तक जगे रहें,लिखने से मजबूर।

तन का ध्यान रखें नहीं, रोग लगे भरपूर।।

साथियो!----

दाँतों में कीड़ा लगा,आँतों में सब रोग।

फिर भी क़लम चला रहे,छोड़ दिए सब भोग।।

साथियो!----

केवल भावों में जिएँ,नहीं चाहिए माल।

सोचें, कैसे पड़ जाए,कण्ठ विजय की माल।।

साथियो!---

परहित ही जीते रहे,गाते रहते छंद।

जनहित ही रचना रचें,धन्य-धन्य कवि-वृन्द।।

साथियो!


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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'

हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखण्ड)



कवि,लेखक जितने मिले,सबका बुरा है हाल।

आँखों में चश्मा चढ़ा,पिचक रहे हैं गाल।।

साथियो!----

अर्द्धरात्रि तक जगे रहें,लिखने से मजबूर।

तन का ध्यान रखें नहीं, रोग लगे भरपूर।।

साथियो!----

दाँतों में कीड़ा लगा,आँतों में सब रोग।

फिर भी क़लम चला रहे,छोड़ दिए सब भोग।।

साथियो!----

केवल भावों में जिएँ,नहीं चाहिए माल।

सोचें, कैसे पड़ जाए,कण्ठ विजय की माल।।

साथियो!---

परहित ही जीते रहे,गाते रहते छंद।

जनहित ही रचना रचें,धन्य-धन्य कवि-वृन्द।।

साथियो!


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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'

हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखण्ड)


ताटंक छंद

 

ताटंक छंद---मात्रा--30।16,14पर यति।तुकान्त-समचरण।अन्त में तीन गुरु।

याद आ रहा हमें बचपना,बीत गया जो राहों में।
हम छोटे-छोटे पग धरते थे,घर,गलियाँ,दो राहों में।
सुबह हुई कब शाम हो गई?कुछ ना   लेना-देना था।
रंग-बिरंगे,चन्द खिलौने, लेकर दिवस बिताना था।
माँ का हाथ बँटाना था,ना मन्दिर हमें सजाना।
पढ़ने-लिखने की कौन कहे?खेलों में समय बिताना। 
गिल्ली-डंडा,छुपम-छुपाई,अड्डू ,कंचे या गोली।   दूर-दूर तक चल देती थी,हम सब बच्चों की टोली।।

डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी, नैनीताल, (उत्तराखण्ड)
8171881903

चित्राधारित कविता लेखन

 

चित्राधारित कविता-लेखन---

चित्त-वृत्ति को पावन करता योग सदा ही,
आत्मा को परमात्मा से मिलवाता ये ही,
अन्तर्वाह्य जगत-शुद्धि का मार्ग यही है,
मोक्ष प्राप्त करने का मात्र उपाय यही है।।

योग दिलाए मुक्ति कष्टदायी रोगों से
सद्ज्ञान बढ़ाये, दूर करे सब भोगों से।
योगाभ्यास करो नित,कहते योगगुरू
लोगों से,
जीवन-जीने की कला सिखाएँ योगों से।।

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डाॅ0,श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी,नैनीताल, (उत्तराखण्ड)
8171881903

मुक्त छंद

 

मुक्त-छंद---

स्वर्णाभा छा गई गगन में
हलचल हुई  धरा के मन में
अँगड़ाई ली शीतल-शीतल
मन्द-मन्द मदमस्त पवन में।।

रजनी दौड़ी-दौड़ी छिप गई
दर-दर भटकी हवा बावरी
रश्मि-तीर छोड़े किरणों ने
खिली रोशनी,दिशा जग गई।।

सुमन,सुरभि मदहोश कर गईं
धीरे-से कलियाँ मुसकाईं,
कोमल डाली भी इतराई
अठखेली पत्तों से कर गई।।

धरती का श्रृंगार देख लो
अनुपम परिवर्तन निहार लो
सुबह-सवेरे दृश्य देख लो
स्वर्णाभा का जाल देख लो।।

मन सुन्दर तो जग सुन्दर है
मानव सुन्दरता सँवार लो
अम्बर,धरती,जल,जन-मन में,
स्नेह,प्यार भर दो जन-जन में।।

डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी, नैनीताल, (उत्तराखण्ड)
8171881903
रचना-तिथि----13.102020

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बाल-कविता

 

बाल-कविता-----

दौड़ रही आँगन में पोती
कभी चहकती,कभी फुदकती
गौरैया-सी चूँ-चूँ करती
फुर्र-फुर्र कर दाना चुगती।

तितली देख पकड़ने जाती
उछल-उछल कर,कोशिश करती
कभी भागती,फिर रुक जाती
इधर मचलती,उधर मटकती।

फूलों को भी वो चुन लाती
उनके सारे रंग बताती
देख-देखकर खुश हो जाती
भोला,प्यारा बचपन जीती।

ढेरों बातें खूब बनाती
दादी के संग गाना गाती
किस्से कभी कहानी सुनती
परियों, गुड़ियों में रम जाती।

सारा दिन सबको उलझाती
खेल-कूद कर जब थक जाती
बड़े प्यार से वो सो जाती
सुन्दर सपनों में खो जाती।

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डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखण्ड)
8171881903

 

चित्राधारित कविता लेखन---

पुष्प मुकुट,उर सुमन माल
चन्दन-तिलक रोली,गुलाल।
बिम्ब फल इव अधर लाल।।
अलकावलि लटकत सुघड़ भाल,                   
अनुपम,मधुर छवि कृष्ण-बाल,            
वंशी बजावत नन्द-लाल।।
मन-मोहिनी सुमधुर चाल,
कोमल,गुलाबी,लाल गाल।।

डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखण्ड)
8171881903

गीतिका छन्द

 

14,12=26 मात्राएँ,अन्त-लघु,गुरु 
   गीतिका छंद

सदगुरु-चरण-रज पुण्य से,पाते सभी
जानिए।
लो ज्ञान जितना ले सको,दिव्यता से लीजिए।।
अभिमान तज कर देखिए, मन समर्पित कीजिए।
भ्रम सभी मिट जाएँगे,ज्योतित शिखा को कीजिए।।

परमात्मा से आत्मा का,मिलन जब हो जाएगा।
ब्रह्म का वैभव अलौकिक, रूप अनुपम छाएगा।।
सम्पूर्ण वसुधा के लिए,समदृष्टि कर लीजिए।
घर,सदन,परिवार जैसा,इस धरा को कीजिए।।
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(गुरुवार को गुरु पर अभी-अभी लिखी रचना)

डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखण्ड)
8171881903

बिम्ब-फल इव लाल

 पुष्प मुकुट,उर सुमन माल

चन्दन-तिलक रोली,गुलाल।

बिम्ब फल इव अधर लाल।।

अलकावलि लटकत सुघड़ भाल,                    

अनुपम,मधुर छवि कृष्ण-बाल,             

वंशी बजावत नन्द-लाल।।

मन-मोहिनी सुमधुर चाल,

कोमल,गुलाबी,लाल गाल।।



डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'

हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखण्ड)

8171881903। 

दोहा---

 अति चतुराई छोड़ दो,भोलापन अनमोल।

सीधे-सच्चे प्रेम को, कटुता से मत तोल।।

माँ तो माँ होती है

          माँ तो माँ होती है 


नमन करूँ मैं प्रथम गुरू को

 माँ तो माँ होती है। 

उदर-कष्ट सह जन्म दिया, 

 वो बेशकीमती मोती है।

दायित्वों का बोझ लिए विपदा,पीड़ाएँ ढोती है।

तब भी  काम-काज करती 

जब सारी दुनिया सोती है।

ममता का संसार लिए 

वो बीज,प्यार के बोती है।

अपना सर्वस्व लुटा देती

निज सुख-सपनों को खोती है।

समदरशी वाली आँखों में

पारदर्शिता होती है।

विषम परिस्थिति जब भीआती,

माँ की गोदी होती है। 

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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'

राष्ट्रीय-ध्वज

 सम्माननीय साथियो!

सादर अभिवादन।


मुझे प्रसिद्ध कवि डाॅ0राकेश शर्मा 'राकेश' जी द्वारा काव्य मैराथन #PeetMeNotLeave में भाग लेने हेतु नामित किया गया है। मैं सात दिनों तक अपनी एक रचना पोस्ट करती रहूँगी। इस मैराथन में कविताओं का अनुवाद किया जाएगा और एक रूसी अल्मानक में प्रकाशित किया जाएगा।प्रतिदिन मैं  अपने एक मित्र को ऐसा करने के लिए नामित करूँगी। आज प्रथम दिन केन्द्रीय विद्यालय की पूर्व हिन्दी शिक्षिका कवयित्री श्रीमती सुशीला धस्माना 'मुस्कान' जी से अनुरोध करती हूँ कि आज से सात दिनों तक इस पटल पर एक रचना पोस्ट करेंगी व प्रतिदिन एक कवि को नामित करने का कष्ट करेंगी।


डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत' 

हल्द्वानी,नैनीताल (उत्तराखण्ड) 



इस पटल पर प्रथम दिन की मेरी रचना---


राष्ट्रीय ध्वज 


राष्ट्रीय ध्वज की इच्छा है कि चाहे विषम से विषम परिस्थितियाँ क्यों न आ जाएँ? पर उसे तो लहराना ही पड़ेगा।वो फहर-फहर कर पुनर्निर्माण के लिए प्रेरित करता ही रहेगा।ध्वज राष्ट्र की अखंडता,एकता,स्वतंत्रता व सीमा की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। सुप्त-हृदय जाग्रत करने के लिए, देश-भक्ति-भाव भरने के लिए तिरंगे को फहरना ही होगा।

उपर्युक्त भावों को दर्शाती काव्य-पंक्तियाँ-------


      राष्ट्रीय ध्वज 


मैं भारत का राष्ट्रीय ध्वज हूँ, 

मुझको लहराना ही होगा।

विपदाएँ कैसी भी आएँ,

मुझको फहराना ही होगा।।


आशा की नव-किरण बनूँगा,

नूतन परिवर्तन होगा। 

जोश,उमंग की तरंग बनूँगा,

जीने का साहस होगा।।


बंजर,सूखी धरती को भी,

हरित-क्रांति,हरियाली दूँगा।

आजादी पर मर-मिटने की-

चाहत मुक्त-उड़ान की दूँगा।।


जन-मन को सम्बल दूँगा मैं,

आत्म-शक्ति,ऊर्जा दूँगा।

फहर-फहर कर नील-गगन में,

नभ-सा विस्तृत मंडप दूँगा।।


माना,कुदरत क़हर ढा रही,

भूमंडल में महामारी है।

बाढ़ कहीं,भूकम्प कहीं तो,

भुखमरीऔर लाचारी है।।


परिणाम सुखद जब होते थे,

तब ऊँचा मुझे उठाते थे। 

विपरीत परिस्थिति आई तो,

क्यों पृथक नीति अपनाते हो?


अपनी छाया-तले,देश-हित,

विविध-योजना शुरू करूँगा।

शपथ-पत्र का साक्ष्य बनूँगा,

संगठन-शक्ति को बल दूँगा।।


उठो!सजाओ माँ को फिर से,

सोया पुरुषार्थ, जगा दूँगा।

निर्माण करो फिर-फिर भारत का,

जय-जयकार मचा दूँगा।।


संविधान की-'गौरव-गाथा',

झूम-झूमकर गाऊँगा।

सबसे पहले-'देश-अस्मिता',

ऐसी बिगुल बजाऊँगा।।


बलिदान दिया जिन वीरों ने,

मैं उनकी महिमा गाऊँगा।

मान बढ़ाया,आहुति देकर,

'अमर-ज्योति' जलवाऊँगा।।

मैं 'अमर-ज्योति' जलवाऊँगा।


डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'

हल्द्वानी,नैनीताल (उत्तराखण्ड)

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गुरु-वन्दना

 गुरु-वन्दना---


सद्ज्ञान, परमानन्द दें जो,उन गुरू की वन्दना। 

सत्कर्म,धर्म से जोड़ दें जो उन चरन की अर्चना।

शान्ति का सन्देश लेकर,बुद्धि रूप दिनेश दें।

मूल्य जीवन के बताकर,नीति का उपदेश दें।

वन्दन,नमन उन चरण में,जिनमें बसी दिव्यात्मा।

अज्ञानता का शमन कर,ज्योतित करें जो आत्मा।

परमब्रह्म-प्रकाश से,द्युतिमान अन्तर्मन हुआ।

गुरु-कृपा से मन-नयन खुल,जगत-हित जीवन हुआ।

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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'

मनहर घनाक्षरी--

 मनहर घनाक्षरी ----

8,8,8,7 वर्ण पर यति,अंत में लघु,गुरु।


बादल उमड़ रहे बिजली कड़क रही 

डरकर कोई नहीं बाहर निकलता,

देख खग,मृग,जन,जीव सब थम गए 

छिप गए कोई नहीं डगर पे चलता

मचल-मचल मन-भँवर हवा में उड़े

पगला स्वयं को ही बार-बार छलता।

झूमती पवन देख तन में लहर उठे

कोई नहीं पास देख बस हाथ मलता


डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'

प्रथम-प्रयास,मनहर घनाक्षरी के लिए (समीक्षा-हेतु ) 

 दोहे प्रयास-


परहित पर-उपकार से,जन्म सफल हो जाय। 

ध्यान लगा जो ईश में,भव-सागर तर जाय।।


श्रेष्ठ कर्म,श्रम जो करें,प्रभु पर कर विश्वास।

बदल जाएँ दुर्भाग्य सब,यदि हो सत्य प्रयास।।

- डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'

  सुहानी-सुबह             कविता 1. रँग में अपने रंग दिया, रवि ने सुबह से ही गगन। देख नभ की अरुणिमा को, चारों दिशाएँ भी मगन।। 2.लालिमा भी प्य...