Tuesday, 28 January 2020

ये कैसा गणतंत्र

देश की  संसद में नागरिकता संशोधन विधेयक पास होते ही विपक्षी दलों ने जनता को  इतना भड़काया व भ्रमित किया कि हमारा प्रजातंत्र सड़कों पर उतर कर सरकारी  सम्पत्ति को ही जलाने लगा।  हिंसा,दंगे,हत्या व आग की लपटों से देश जलने लगा।ऐसे वातावरण में आह!से निकली कुछ  पंक्तियाँ--------
      ये कैसा गणतंत्र?
ये कैसा गणतंत्र हमारा, ये कैसा गणतंत्र?

तोड़-फोड़ कहीं खून-खराबा,
तार-तार इज्जत,मर्यादा।
आगजनी,दंगे-फ़साद में
लिप्त रहे जनतंत्र।।
ये कैसा गणतंत्र हमारा,ये कैसा गणतंत्र?

फाड़ दिया माँ का ही आँचल
जला दिए श्रृंगार,
मातृभूमि पर हमला करना,
अपनों का षडयंत्र।।
ये कैसा गणतंत्र हमारा,ये कैसा गणतंत्र?

अपने ही अपनों को मारें
समझ नहीं, मतिमंद हैं सारे।
ज़हर  घोल कानों में इनके
फूँक दिया विषमंत्र।।
ये कैसा गणतंत्र हमारा, ये कैसा गणतंत्र ?

विस्फोटों से दिल दहल रहा,
सीने छलनी हैं बेशुमार।
अपने ही करते जब प्रहार,
होता है दूषित लोकतंत्र।।
ये कैसा गणतंत्र हमारा  ये कैसा गणतंत्र ?

मिला न अवसर राजतिलक का,
मिला न मौका गद्दी का।
ऐसे नेता भ्रष्ट चलाते,
दाम,दण्ड के यन्त्र।।
ये कैसा गणतंत्र हमारा, ये कैसा गणतंत्र ?

चक्रव्यूह,शतरंज बिछाकर,
जनता को  भरमाते।
फिर कूटनीति से बुरा फँसाते
नेताओं के तन्त्र।।
ये कैसा गणतंत्र हमारा  ये कैसा गणतंत्र ?

अज्ञानी,भोली,मूर्ख प्रजा,
आपस में ही भिड़ जाती है,
लोभी,भोगी नेताओं के
जपती रहती है मंत्र।।
ये कैसा गणतंत्र हमारा,ये कैसा गणतंत्र ?

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डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत'

Thursday, 9 January 2020

चाह

चाह

राष्ट्र की एकता के स्वर बजाकर गीत गाऊँ मैं।
धरा से प्रेम करने की
मधुर सरगम सुनाऊँ मैं।।

देश ही राग,देश आलाप,
देश ही तान सप्त-सुर में।
तराना छेड़ दूँ ऐसा कि
भर दूँ जोश जन-जन में।।


झेलना चाहती मैं, यातनाएँ उन शहीदों की।
जो हँसकर काट देते थे-
'सज़ाए मौत' जीवन की।।


उढ़ाकर ओढ़नी माँ को हरी, धानी या बासंती,
बनाना चाहती हूँ
हर चमन की डाल रसवंती।।


पहनकर केसरी धोती
बनी जो शुद्ध खादी की
झूलना चाहती काँटों भरी
सूली भगत सिंह की।।


उठाकर खड्ग,बरछी,ढाल राणा और रानी के।
मिटाना चाहती अन्याय, शोषण,भेद वसुधा के।।
भुलाकर प्रान्त,भाषा,
रंग की असमानता सारी।
मिलाना चाहती हूँ संस्कृति
चारों दिशाओं की।।


तिरंगा हाथ में ऊँचा उठाकर
शान- से जग में।
यूँ ही बलिदान होना चाहती अपने व़तन पर।।
9.ये भारत है शहीदों का
यहाँ बलिदान वीरों का।
करूँ अर्पण रक्त,तन-मन,
नमन शत-शत कोटि वन्दन।।


-----------डाॅ0 गीता मिश्रा
(राष्ट्र के नाम समर्पित चन्द पंक्तियाँ)

याचना

याचना

ओ सावन-मनभावन मेघा! जन-जन-मन पावन कर दे।
वसुधा के अँचल को जल से, हरा-भरा निर्मल कर दे।।
तू गरज मगर उतना ही गरज, तेरी गर्जन 'जयगान' लगे।

तू बरस यहाँ उतना ही बरस,
धरती को जितनी प्यास लगे।
मत 'फट पड़ना' तू अपनों पर,
जो तेरी राह निहार रहे।
तेरी जलधाराओं से ही,
जो जीवन यहाँ गुजार रहे।।


तेरा विधान'परहित' का है,
अपनी मनमानी मत करना।
हो मन में कितनी उमड़-घुमड़,
सीमा-उल्लंघन ना करना।।


ग़र रौद्र-रूप तेरा होगा,
सब उथल-पुथल मच जाएगी।
आर्त्त-नाद,क्रंन्दन-स्वर से,
धरती कंपित हो जाएगी।।


तेरे तांडव-नर्तन से तो,
हर दिशा यहाँ थर्राएगी।
अतिवृष्टि,बाढ़,भू-कंपन से,
जल-मग्न धरा हो जाएगी।।


याचना यही तुझसे मेरी,
भू का नूतन श्रृंगार रहे।
सम्पूर्ण विश्व के अधरों पर,
नित मन्द,मधुर,मुस्कान रहे।।


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डाॅ0 (श्रीमती) गीता मिश्रा
रचना-तिथि--25.7.2018

तिरंगा


मंगल-गीत

आगत गणतन्त्र-समारोह 2019 के शुभ-अवसर पर विश्व -कल्याण की कामना वाली पूर्व-रचित रचना प्रेषित कर रही हूँ------

मंगल-गीत

मंगल सभी का हो यहाँ
सबके मधुर सम्बन्ध हों,
मैं दे रही दिल से दुआएँ
सब सुखी सम्पन्न हौं।

वर्षभर शुभकामनाओं
के दीये जलते रहें,
हर द्वार पर खुशियों के
बन्दनवार लहराते रहें।
सत्यता की धूप देकर
मन-भवन पावन करें,
दुर्भावनाओं का हवन
सद्भावों का अर्चन करें।

सम्मान, उन्नत ज्ञान का
चन्दन लगा हो भाल में,
संकल्प का हो आचमन
कर्त्तव्य पूजन-काल में।

प्रेम-धुन से शंख-सा
जयघोष गुंजित हो सके,
सुख-शांति के तोरण-कलश
चारों दिशाओं में सजें।

पालने में प्यार से-
बचपन सदा पलता रहे,
यौवन ,युवा का खिल उठे,
सौन्दर्य बिखराता रहे।
जो ज़िन्दगी के अनुभवों
का सार लेकर जी रहे,
उन पूर्वजों के भव्य,
अनुपम ज्ञान की छाया रहे।

अन्त में----
कोई न भूखा हो ज़हाँ में
अन्न,जल,धन पा सकें,
निर्धन भी अब हर हाल में
खुशहाल जीवन जी सकें ।
------ डाॅ0 गीता मिश्रा

'भारतमाता'

26जनवरी 2019, गणतंत्र -दिवस के राष्ट्रीय पावन-पर्व पर भारतमाता के अनुपम सौन्दर्य
को याद करते हुए कुछ पंक्तियाँ लिखीं। हम सब भारतीयों की विचारधारा, भारत माँ के प्रति
सर्वस्व-समर्पण की सदैव बनी रहे। इस आशा के साथ प्रेषित कर रही हूँ रचना--

'भारतमाता'
भारतमाता
मैं,विश्वपटल पर सबसे पावन,
दिव्य भूमि जन-जन-मन-भावन,
निर्झर,नदियों के संगम में,
मधुर-मधुर-मृदु गीत सुनाती।
मैं भारतमाता कहलाती।

है रूप नवल,श्रृंगार नवल,
निज बच्चों पर अनुराग धवल,
मैं नीर-नेह-नयनों में ले,
सिंचित कण-कण को करवाती।
मैं भारतमाता कहलाती।

विमल,श्वेत हिमवान है मुझमें,
गहन-सघन वन-प्रांत है मुझमें,
उमड़ रहा रत्नाकर देखो,
मचल-मचल नदियाँ लहरातीं।
मैं भारतमाता कहलाती।

मैं, सरल-सहज भावों वाली,
माधुर्य, मनोहर गुणवाली,
रस,छंद,कला से सजी-धजी,
कुदरत की रचना मदमाती।
मैं भारतमाता कहलाती।

फल-फूलों से लदे हैं टीले,
रंग-बिरंगे बड़े रसीले,
मेरे खेतों की हरियाली,
अनुपम सुन्दरता बिखराती।
मैं भारतमाता कहलाती।

मैं भोले - से बचपन में हूँ,
बाग-बगीचे, उपवन में हूँ,
मैं,नील,हरित,पीताम्बर वाली
थिरक-थिरक दिल धड़काती।
मैं भारतमाता कहलाती।

रंगीन तितलियाँ मँडरातीं,
सुरभित - सुमनों पर इतरातीं,
जब विहग-वृन्द कलरव करते,
तब मन्द-मन्द मैं मुस्काती।
मैं भारतमाता कहलाती।।

रचना-तिथि----26.1.2019
डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा।

सखि-कथन

वसन्त-ऋतु के आगमन पर एक सखि अपनी प्रिय सहेली से कहती है--'एक काले भ्रमर ने गुनगुनाकर वसन्त-आगमन का सन्देश दिया और उसके रूप-सौन्दर्य का ऐसा वर्णन किया कि मेरा तन-मन भी वासन्ती हो गया।
वसन्त-आगमन
---------------------

सखि-कथन----
सखि!स्याम-मधुप,आ,पास मेरे,
गुन-गुन करता मँडराने लगा।
फिर कंत-वसंत के आवन का,
संदेशा रसिक! सुनाने लगा।।

भ्रमर-कथन----
सुकुमार वसंत का रूप नवल,
है पूर्ण चन्द्र,चाँदनी धवल।
मौक्तिक तारे झिलमिला रहे
पर्वत,घाटी खिलखिला रहे।।

अब हुई सुबह,सिंदूरी-सी ,
हरियाली,हरित मखमली-सी,
पीले -पीले खेतों ने कर दी,
वासन्ती काया,वसुधा की।।

हैं झूम रहे सब पीत-सुमन,
प्यासे भँवरे करते गुंजन,
हौले-हौले मृदु गीत सुना,
पालना झुलाती मस्त-पवन।।

कलियाँ भी लुक-छिप झाँक रहीं
खिलने का बहाना ढूँढ रहीं।
रंगीन तितलियाँ देख-देख,
बचपन का आनन्द उठा रहीं।।

फूलों से सजी, हर डाल लदी,
वन-उपवन मधुर बयार चली।
सब चंचल हैं-सर,ताल,नदी,
निर्झर-जल-सरस फुहार चली।।

लो उठी हूक! कोयल बोली,
बावली! अभी तक है भोली।
'कुहुक' रही पंचम स्वर में,
मतवाली अमुआ पर डोली।।
सखि-कथन---
रस,रूप,गन्ध का लोभी अलि!
उड़ चला,जिधर थे सुमन-वृन्द,
मेरा मन वासन्ती करके,
पी रहा वहाँ,सुमधुर-मकरन्द।।

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डाॅ0(श्रीमती)गीता मिश्रा
रचना-तिथि---6.2.2019

हिन्द-सेना की चेतावनी

कश्मीरी भटके युवकों को
हिन्द-सेना की चेतावनी---

कश्मीरी छद्मी युवको सुनलो!
छल-बल करना बन्द करो,
भारत के अँचल में पलकर,
अब, अरि-बल बनना बन्द करो।।

कर सचेत,अनगिनत बार,
तुमको समझाया बार-बार।
हमने मानवता के नाते,
सुविधाएँ दे दीं बेशुमार।।

तुम डंक मार,ज़हरीले निकले,
घर में फ़न फैलाए निकले
आॅस्तीन का साँप निकले,
विषधर! खूब विषैले निकले।।
खूँखार बने,गद्दार बने,
रुपयों के आगे भटक गए।
हाथों में प्रस्तर उठा-उठा,
निज सेना पर ही पटक गए।।

धिक्कार है उस नादानी को!
जो अपनों पर ही वार करे।
धिक्कार है भ्रमित जवानी को!
जो माँ का ही संहार करे।।

हम सेनानी,हिन्दुस्तानी,
रणवबीर, बाँकुरे,बलिदानी।
भारत-माँ की रक्षा में हरदम,
हँस -हँसकर देंगे कुर्बानी ।।
ज़िन्दा हैं जब तक हम प्रहरी,
अस्त्रों से दागेंगे गोली।
कश्मीर, हिन्द की है धरती
मारेंगे गीदड़ की टोली।।

शत्रू की जंगी चालों को
घातों को,सभी कुचालों को,
हम तहस-नहस कर डालेंगे,
हम ध्वस्त-पस्त कर डालेंगे।।

हुँकारेंगे , ललकारेंगे,
चुन-चुनकर अरि को मारेंगे।
हम वीर-धीर सेनानी हैं,
डंके की चोट सुनाएँगे।।

बहुत कर लिया रक्तपात,
अब भस्म तुम्हें हम कर देंगे।
विजयी भारत में घूम-घूम,
नारा 'जयहिन्द' लगाएँगे।।

इस स्वर्ग -समान पुनीत धरा पर,
हिन्द-तिरंगा ही फहरेगा।
नभ तक झंकृत होगा 'जयहिन्द,
'बन्देमातरम्' गूँजेगा।।
बन्देमातरम्' गूँजेगा।।
------***--------

रचना-तिथि--22-2-2019
डाॅ0 (श्रीमती) गीता मिश्रा

वासन्ती महारास

होलिकोत्सव पर समर्पित चन्द पंक्तियाँ-----
मानवीकरण द्वारा होली,दिशा,धरा,पवन का, वसन्त के साथ होली खेलने का चित्रण है ।अन्त में होली तथा महारास की धूम सब कृष्णमय हो गई।'श्रीकृष्णःशरणम् मम्'।

वासन्ती महारास
----------------------

ऋतुराज 'वसंत' उमंग लिए
मदमस्त 'पवन' संग झूम रहे,
यह देख जली,मचली 'होली'
लेकर आई कुछ रंग नए।।

पिचकारी रंग-भरी मारी,
कोमल 'वसंत' तिलमिला गए।
जब रंग गुलाल मला गालों पर,
प्रिय 'वसंत' खिलखिला गए।।

फिर झूम-झूम,कुछ घूम-घूम,
कुछ महक-महक आ गई 'दिशा'
'होली-वसन्त' का मिलन देख,
अकुलाई कुछ बलखाई 'दिशा'।।

मुरली,मृदंग,ढप, ढोल बजे,
शहनाई बजी यमुना-तीरे।
रच गया रास,छिड़ गया फाग,
रंग-स्याम चढ़ा धीरे-धीरे ।।

दुल्हन-सा सब श्रृंगार किए,
'धरती' भी अब रंगीन हुई।
फिर महारास की धूम मची,
'कान्हा' में ही तल्लीन हुई।।

ये 'पिय-वसंत' ही 'कान्हा' है,
वासन्ती-रंग 'व्रजबाला है'।
होलिका पवन' संग'धरा','दिशा',
हर गोपी देवी-बाला है।।

आओ!हम भी सप्त रंगों से,
होली का त्यौहार मनाएँ।
सुमनों की बौछार करें,
सब 'कृष्ण'-प्रेम में खो जाएँ।।

-----------------------
डाॅ0(श्रीमती)गीता मिश्रा
रचना-तिथि-15.3.2019

सावन-संगीत

सावन-माह की प्रारम्भिक बरसात देख हृदय-घट में भाव कुछ इस तरह उमड़ पड़े----
सावन-संगीत
--------------------

सुनो प्रिय! सावन का संगीत।
मधुर-मन-भावन वाला गीत ।।

'मेघ-राग' सावन ने गाया,
बादल उमड़ पड़े,
मचल-मचल फिर घुमड़, बरस कर,
धरती से मिल गये।
निहारो मिलन, मेरे मनमीत!
प्रकृति की दिव्य,निराली प्रीत।।

सुनो प्रिय! सावन का संगीत।
मधुर-मन-भावन वाला गीत।।

'आरोह-अवरोह','पकड़' सुनाकर
करे राग-विस्तार,
गति बिलम्ब -'आलाप'-आलापे,
तानों की झनकार।।
नाथ!ये आत्मिक-सुख-संगीत।
पारलौकिक,आध्यात्मिक गीत।।

सुनो प्रिय! सावन का संगीत।।
मधुर-मन-भावन वाला गीत।।
'होरी','ध्रुपद','धमार' सुनाता,
छेड़े कभी 'तराने'।
कभी 'ठुमरियाँ','थाट','मुरकियाँ'
लेता उलझी 'तानें'।।
मेरे अन्तर्मन! अनहद मीत!
'नाद'-मय-समय न जाए बीत।।

सुनो प्रिय! सावन का संगीत।
मधुर-मन-भावन वाला गीत।।

पहले रिमझिम पड़ीं फुहारें,
फिर बरसा अमृत-सा पानी।
सावन-रूप- झमाझम देखा,
धरती ने की मनमानी ।।
प्राण!सच्ची है इनकी प्रीत।
हरित छवि,दिव्य रूप,भव-मीत।।

सुनो प्रिय! सावन का संगीत।
मधुर-मन-भावन वाला गीत।।

सूख गए थे सभी स्रोत-जल,
विपदाएँ भी बरसी थीं।
धूप,तपन,लू,गर्मी से,
सारी धरती झुलसी थी।
सजन!दुख-सुख जगती की रीत,
अन्ततः सावन की ही जीत।।

सुनो प्रिय! सावन का संगीत।
मधुर-मन-भावन वाला गीत।।
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डाॅ0 (श्रीमती)गीता मिश्रा
25.6.2019

तिरंगे वाली राखी

सन् 2019 में राखी व राष्ट्रीय पर्व पन्द्रह अगस्त के, साथ-साथ आगमन पर,
सैनिकों की अंतरंग इच्छा को कविता के रूप में कुछ इस तरह लिखने का प्रयास किया।आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में-----

तिरंगे वाली राखी

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हम रक्षक हैं सीमाओं के,
प्रहरी हिन्दुस्तान के ।
बहिनों!राखी हमें भेजना,
हम बाँधेंगे शान से।।

यूँ तो दिव्य-दुलार तुम्हारा,
हमें सदा मिलता रहता।
छोटी-बड़ी सभी बहिनों का,
प्यार कलाई पर सजता।।

पर अबकी बार तिरंगे वाली,
राखी सैनिक पहनेंगे।
भाई-बहिन के स्नेह में डूबा
देश-प्रेम दर्शाएँगे ।।

आजादी के पुण्य-पर्व पर,
पहन इसे गर्वित होंगे।
मिला कदम समवेत स्वरों में
आगे बढ़ते जाएँगे।।

सौभाग्य जगा है भारत का,
दुर्भाग्य भगा है भारत का।
खंडित कश्मीरी हिस्से को,
भारत का अंग बनाएँगे ।।

ऐसी राखी भेजो बहिनों!
बस हिन्द तिरंगा ही दमके।
एक तिरंगा हाथों पर तो
एक कलाई पर चमके।।

अमर रहे 'पन्द्रह अगस्त',
नभ-भेदी बिगुल बजाएँगे।
राखी वाले हाथों से ही,
सुनो! तिरंगा फहराएँगे।।

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---- डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत'
रचना-तिथि----8.8.2019

मैं हिन्दी हूँ

हिन्दी सप्ताह,हिन्दी दिवस,हिन्दी पखवाड़ा और हिन्दी माह।हर साल की तरह सितम्बर माह में तरह-तरह के आयोजन हर वर्ष होते आ रहे हैं परन्तु हिन्दी की स्थिति आज भी वैसी ही दयनीय है।वर्ष 2000 में जो कविता लिखी थी आज भी वो
प्रासंगिक लगती है क्योंकि हिन्दी को आज भी वो सम्मान नहीं मिल पाया जिसकी वो अधिकारी है। कविता में हिन्दी
की दयनीय स्थिति की संगति
सीताजी से बैठाई है।
मैं हिन्दी हूँ

वर्षों से शोषित
अधिकार -वंचिता
निष्कासितअपनों से
परित्यक्ता'सीता'-सी
मैं हिंदी हूँ।
अंग्रेज़ियत की रावण-भुजा द्वारा घसीटी जाती--अपहृत नारी-सी,चीखती-चिल्लाती,
रोती विलखती
सिमट कर, देहरी पर
लज्जा बचाती,
मैं हिन्दी हूँ।
अपने ही देश में,
अपनों के बीच में,
शंकित दृष्टियों में,
उठती उँगलियों में
अपमानित,लज्जित
अग्नि-परीक्षा देकर
मर्यादा बचाती,
मैं हिंदी हूँ।
और अब शरणांगतवत्सल
वाल्मीकि-सदृश
चन्द लोगों के मन-आश्रम में अस्मिता छिपाए,
संस्कृति बचाए
हिन्दुस्तान की 'आत्मा'
हिन्द का 'प्राण'-
स्व-अस्तित्व को, पालती-पोषती,
मैं हिन्दी हूँ।
घोषित 'रानी','राजरानी'
कागजी सिंहासन की,
लेकिन
एकाकी,विरह-दग्धा,
शोक से पागल,
विषमताओं से घिरी,
फिर भी आशान्वित -
आँग्लभाषा से अधिक
सम्मान पाने को तरसती
मैं हिन्दी हूँ।

-------------------
डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत'
प्रकाशित--स्मारिका -सहस्राब्दी अखिल भारतीय राजभाषा संगोष्ठी,भुवनेश्वर 18.अक्टूबर 2000।

आकाश मन का चाहती हूँ

सांसारिक बन्धनों में व्यक्ति इस तरह फँसा हुआ है कि चाहते हुए भी उससे बाहर निकल नहीं पा रहा है।प्रकृति की गोद में ही पल रहा है पर उसकी महत्ता से अनभिज्ञ है।उसका सौन्दर्य-लाभ तक नही ले पा रहा है।मन की इसी धारणा ने चन्द पंक्तियों का सृजन किया----------

आकाश मन का चाहती हूँ

1.मोह-माया-जाल से अब दूर जाना चाहती हूँ,
मुक्त होकर उड़ सकूँ, आकाश मन का चाहती हूँ।।

2.कुदरती रंगों में रँगना और सँवरना चाहती हूँ,
उदित रवि की लालिमा से,मैं उलझना चाहती हूँ।।

3.मधुर किसलय,सुमन-सौरभ-संग खिलना चाहती हूँ,
चटखती,इतराती कलियाँ देख,हँसना चाहती हूँ।।

4.ओस की मौक्तिक चमक से खेलना मैं चाहती हूँ,
झूमती फसलों में लहराकर, मचलना चाहती हूँ।।

5.स्वर मिला,खग-वृन्द-संग,सरगम सुनाना चाहती हूँ,
पक्षियों के झुँड में,मैं भी फुदकना चाहती हूँ।।

6.पंचम स्वरों की मल्लिका का गीत सुनना चाहती हूँ,
डाल मैं छिप,पिक-सदृश,मैं भी कुहुकना चाहती हूँ।।

7.प्रकृति का अनुपम खजाना, लूटना मैं चाहती हूँ,
चुपचाप,लुक-छिप,दिव्य,अद्भुत लाभ लेना चाहती हूँ।।

-----डाॅo गीता मिश्रा 'गीत'
रचना-तिथि---7.10.2019

सुहानी-सुबह


20-12-16 में लिखी पंक्तियाँ आज प्रेषित कर रही हूँ।प्रातःकाल भ्रमण के दौरान, उदय होते सूर्य के साथ-साथ आये परिवर्तन को देखकर कुछ लिखे बिना नहीं रह सकी।

सुहानी-सुबह
1.रंग में अपने रंग दिया,
रवि ने, सुबह से ही गगन।
देख नभ की अरुणिमा,
हो गई दिशाएँ भी मगन।।

2.लालिमा भी प्यार से,
उन बादलों पर छा गई थी।
दूर अपनों से छिटक,
जिनमें उदासी आ गई थी।।

3.जागते, फिर फड़फड़ाते,
पक्षियों के पंख, तरु पर।
करने लगे कलरव कहीं,
क्रन्दन कहीं, हर डाल पर।।

4.गुनगुनाते भँवर,
तितली खोलती हैं पंख कोमल।
डाल में छिप, गा रही,
पंचम सुरों में स्याम-कोयल।।

5.फूल-सी माँ खिलखिला कर,
खोलती घर,द्वार,आँगन,
फिर चलीं,निज बाल-कलियों
को सुनाने गीत-गायन।।

6.वन,बाग,उपवन,वाटिका,
गुंजित हुईं सब घाटियाँ
वीणा बजाकर पवन ने,
झंकृत करीं सब वादियाँ।।

7.छिड़ गया संगीत अनुपम,
इस धरा से उस गगन तक।
चल पड़ा जीवन अनोखा,
सुरमयीसुबह से, शाम तक।।

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‐--डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत'

धुँध वाली धरती

आजकल कहीं बर्फ की चादर है तो कहीं कोहरे की।
धरती पर कोहरा छाया देखकर कुछ यथार्थ व काल्पनिक भाव इस तरह जगे कि सूर्य व धरा का मानवीकरण कर बैठे।
आभारी रहूँगी आपके वाचन की।

धुँध वाली धरती


धुंध-चादर,हरित-तन पर,
करके अवगुंठन-वदन पर
सरसराती,मदमदाती,
धवल नभ तक छिपछिपाती,
धरती मानो पग बढ़ाये,
चल पड़ी सूरज से मिलने।।

भीगा-भीगा श्वेत अम्बर,
झीना-झीना पट पहनकर,
प्रेम-पूरित गीत गाती-
हौले-हौले गुनगुनाकर,
धरती जैसे पग बढ़ाये-
चल पड़ी सूरज से मिलने।।

पथ में उलझी अटपटी-सी,
सहमी-सहमी,अटकती-सी,
सोचती, पलकें झुकाती,
जानें क्यों फिर-फिर लजाती?
धरती अब भी पग बढ़ाये,
चल रही सूरज से मिलने।।

रवि को नभ पर ही मनाने,
साथ हँसने-मुस्कुराने,
गर्म किरणों में मचलकर,
अनावरण अपना करवाने,
धरती सचमुच पग बढ़ाये,
चल रही सूरज से मिलने।।

धुंध में लिपटी धरा को-
देख, पीड़ा-मुक्त करने,
डालकर निज कर-निकर,
रवि भी चला कोहरा हटाने।।

अब ये दोनों पग बढ़ाये,
चल रहे आपस में मिलने।।

देखकर परिदृश्य अनुपम,
विश्व-जन प्रमुदित हुए,
अद्भुत,अलौकिक मिलन से,
सब काम भूतल पर हुए।।

आओ!चलें हम भी सदा-
सहयोग से सद्भाव से,
वसुधा-रवि जैसे मिले,
परमार्थ-हित नि:स्वार्थ से।।


डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत'
रचना-तिथि---28.12.19
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नव- वर्ष(जागरण-गीत)

नव- वर्ष(जागरण-गीत)
नव-वर्ष आ गया है,
नींद से जगा रहा।
देश-प्रेमियों को फिर,
नया सबक़ सिखा रहा।
ये चेतना का वर्ष हो,
ये जागृति का वर्ष हो।
आतंक के विरुद्ध,
जंग जीतने का वर्ष हो।
प्रचंड रौद्र रूप हौं,
जीत के ही गीत हौं।
जो दस को मारकर मिटें,
ऐसे देश-वीर हौं।
रक्त में उबाल हो,
नसों में तेज धार हो।
जान देने के ज़ुनून
की बड़ी कतार हो। '


'पंचजन्य' फिर बजे,
दिशाएँ गूँजने लगें।
'गांडीव' कान तक तने,
डंका युद्ध का बजे।
हुँकार से,दहाड़ से,
खड्ग के प्रहार से।
आतंकी मुँड काट दो
जो 'पाक' में ही जा गिरें
बन्दूक से भी दनदनाती
गोलियाँ निकल पड़ें।

निशाना तोप से लगे,
गगन से बम बरस पड़ें।
माँ को छूने,छीनने की
'पाक' -चाल नष्ट हो।
कश्मीरवासियों को ओह!
अब न कोई कष्ट हो।
तैयार पूरा देश हो,
लहू में पूरा जोश हो।

उठो,बढ़ो,मरो -मिटो
आतंकियों पे रोष हो।
सत्य की विजय लिए,
'तिरंगा' फरफराता हो।
आतंक का सफाया देख,
'हिन्द' लहलहाता हो।'

--डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा (1-1-2017)

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