Monday, 4 March 2024

 सुहानी-सुबह

           कविता

1. रँग में अपने रंग दिया,

रवि ने सुबह से ही गगन।

देख नभ की अरुणिमा को,

चारों दिशाएँ भी मगन।।


2.लालिमा भी प्यार से,

   उन बादलों पर छा गई थी।

   दूर अपनों से छिटक,

  जिनमें उदासीआ गई थी।।


3.जागते फिर फड़फड़ाते,

 पक्षियों के पंख तरु पर।

 करने लगे कलरव कहीं,

 क्रन्दन फुदककर डाल पर।।


4.गुनगुनाते भँवर,तितली-

  खोलती हैं पंख कोमल।

  डाल में छिप गा रही,

 पंचम सुरों में कुहुक कोयल।।


5.फूल-सी माँ खिलखिलाकर,

   खोलतीं घर द्वार आँगन।

  फिर चलीं निज बाल-कलियों 

   को सुनाने गीत-गायन।।


6.वन,बाग,उपवन,वाटिका,

    गुंजित हुईं सब घाटियाँ

   वीणा बजाकर पवन ने,

    झंकृत करीं सब वादियाँ।।


7.छिड़ गया संगीत अनुपम,

  इस धरा से उस गगन तक।

   चल पड़ा जीवन अनोखा,

  सुरमयी सुबह से शाम तक।।


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    डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत'


 गीता छंद---मात्रा भार 14  12=26


अधरोष्ठ द्वय सरसिज सदृश, कोमल चटख रक्ताभ।

कटि करधनी झिलमिलाती,

रुनझुन वलय श्वेताभ।

स्याम-तन पर पीत अम्बर ,

ज्यों नील सर पीताभ।

कमनीय अद्भुत् कृष्ण छवि,

 लोचन जलज नीलाभ।।


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    डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत'


 हंस दोहा -14 गुरु20 लघु


नैतिकता पल्लवित हो,लिए पुरातन कर्म,

सदाचार पुष्पित करे,सत्य सनातन धर्म।।


- डॉ० गीता मिश्रा 'गीत'


Saturday, 24 February 2024

 दोहे - कलयुगी भटका मानव   


अकर्मण्य है आलसी,माँगे छप्पन भोग।

केवल अपना 1 ध्यान है,तब भी लगते रोग।।


जीवन में भटके सदा,घर से जाता भाग।

पर नारी को मानता,अपनी लगती नाग।।


कथनी करनी हैअलग,छल बल हैं हथियार।

रख घमण्ड धनराशि का,लड़ने को तैयार।।


शतरंजी चालें चले, गिरी हुई है सोच।

बात-बात पर झटकता,कब आएगी लोच।।


मीठी बातों में फँसा,कर देता मजबूर।

निज उल्लू सीधा करे,फिर कर देता दूर।।


जाल बिछाकर फाँसता,छिपकर करता वार।

ऐसा मानव कलयुगी,बना धरा पर भार।।


डॉ०श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'


 दोहा -

नहीं चाहते अधर भी, निकलें घट के बोल।

मुखरित होते ही कहीं, खुल जाये ना पोल।।


डॉ० गीता मिश्रा 'गीत'


 माँ तो बस माँ होती है 


नमन करूँ मैं प्रथम गुरू को माँ तो बस माँ होती है। 

उदर-कष्ट सह जन्म दिया,वो बेशकीमती मोती है।

दायित्वों का बोझ लिए विपदा, पीड़ाएँ ढोती है।

तब भी काम-काज करती जब सारी दुनिया सोती है।


ममता का संसार लिए वो बीज,प्यार के बोती है।

निज सर्वस्व लुटा देती, सुख-सपने अपने खोती है।

समदरशी वालीआँखों में पारदर्शिता होती है।

विषम परिस्थिति जब भी आती,

माँ की गोदी होती है। 

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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'


 शरद-पूर्णिमा-


पूर्णेन्दु गगने शोभितम्,शीतल मधुरतम् दिव्यतम्।  

उज्ज्वल दिगन्त सुधवलतम,

उत्तुङ्गजल मनमोहितम।



डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत' 


  लघुकथा----घर का बन्धन


घने जंगलों के बीच ऊँची पहाड़ी पर छोटा-सा पत्थरों से बना मकान।  भुवन अपने बूढ़े,आखों की रोशनी खो चुके माता- पिता के साथ रहता था।घर में बँधी गौ माता आजीविका का एकमात्र सहारा थी। 

       बाईस साल के भुवन का विवाह,दूर पहाड़ी पर बसे निर्धन परिवार की कन्या तारा के साथ कर दिया गया। एक महीने बाद ही वह रुपये कमाने शहर चला गया। 

     गौमाता,बूढ़े सास-श्वसुर की सेवा पिछले तीन वर्षों से करते हुए तारा हर दिन दूर तक जाते टेढ़े-मेढ़े रास्तों को,ऊँचे टीले पर खड़ी पथराईआँखों से निहारती,पति के आने का इन्तजार करती है। पर भुवन तो घर के बंधन से मुक्त रहने शहर चला गया।

   आजकल शहर की चमक-दमक वाली ज़िन्दगी में रमजाने वाले भुवन जैसे लड़कों को अपना घर ही  बन्धन लगने लगता है।

 

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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'


 गीत - कैसी ये बनाई दुनिया कन्हाई।


1. तन मन दौलत भ्रमित किये हैं,

जन विष घोलत सहज पिये हैं,

भव सागर दिन रात डराये

गहरी हूँ बहाई चले आ सहाई।।


कैसी ये बनाई दुनिया कन्हाई।


2.भटक रही हूँ जीवन पथ पर,

उलझ गई मैं नयन नीर भर। 

धड़कत उर अति ही घबराये,

ठहरी हूँ सताई विपदा दहाई।।


कैसी ये बनाई दुनिया कन्हाई।


3.विषय तृषित करते दिन रैना,

    राह देख पथराये नैना।

    बंधन मुक्ति दिलानेआजा,

    सुमिरन कर धार बहाई।।


कैसी ये बनाई दुनिया कन्हाई।


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डॉ०श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'


 विषय---दीपक


1.मैं माटी का छोटा दीपक,

 पथआलोकित करता हूँ।

 जलता रहता,दुःख सहता पर,

 जग-मग ज्योतित करता हूँ।।


2.करूँ समर्पण तन-मन अपना,

 परहित धर्म निभाता हूँ।

 छोड़ स्वार्थ, परमार्थ ही जीता,

 जनहित नीति सिखाता हूँ ।।


3.मैं,बना उजाला तम-पथ का,

  नि:स्वार्थ स्वयं जल जाता हूँ।

 जो भी नेह से भरता रहता,

  उसका साथ निभाता हूँ।।


5.जीवन भले ही छोटा मेरा

   लेकिन राह दिखाता हूँ।

  अन्त समय तक जल-जलकर

  मैं,अपना धर्म निभाता हूँ।।


4.आशा सदा बनाए रखना

हर पल ध्यान रखो मन में।

जीवन-ज्योति जलाए रखना, 

जब तक प्राण रहे तन में।।


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डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत' 


 बाल-रचना----घर का मन्दिर        


दादी!मन्दिर में आने दो,

थोड़ी-सी जै-जै करने दो।

घंटी तुम तो रोज बजाती,

मुझको आज बजाने दो।।


आजा! मेरे भोले नटखट,

तुझे सिखा दूँ सबकुछ झटपट।

तू ही मेरा स्याम-सलौना,

जय-जय-जयश्रीराम कहो ना।।


रंग-बिरंगे कितने प्यारे!

पूजा के सामान तुम्हारे। 

यहाँ बैठकर क्या करती हो?

बस माला ही क्या जपती हो?


अम्मा!पानी क्यों रक्खा है?

क्या कान्हा ने सब चक्खा है?

मुझको तो मन्दिर में सारे

लगते खेल-खिलौने प्यारे।।


पंचपात्र' में रखते ही जल,

गंगाजल बन जाता है।

मन्दिर का पानी प्रसाद फल

अमृत बनकर आता है।।

   

प्रभु की चम्मच'आचमनी'है,

इससे ही वो जल पीते हैं।

थोड़ा-सा बस उन्हें चढ़ा दो, 

फिर हम सुख से जीते हैं।।


यह छोटी-सी 'चन्दनदानी,'

रंग-बिरंगी बड़ी सुहानी। 

लाल-लाल रोली कहलाती,

पीला चन्दन रोज लगाती।

 

फूल चढ़ाकर उन्हें सजाती,

दीपक धूप कपूर जलाती।

नहलाकर,टीका करती हूँ, 

मंत्र,श्लोक,भजन कहती हूँ।


दाँये कर से करूँआरती,

बाँये से घंटी बज जाती।

धीरे-धीरे चँवर डुलाती,

जोर-जोर से शंख बजाती।।


सबके सुख की करूँ कामना,

बढ़े और भी भक्ति-भावना।

प्रभु से मागूँ क्षमा,याचना,

तुम भी विद्या,बुद्धि माँगना।।


मैं भी पूजा रोज करूँगा,

ताली जोरों से पीटूँगा।

कान्हा जी को भोग लगाना

अम्मा तुमसे ही सीखूँगा।।


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डॉ० गीता मिश्रा 'गीत'


 बचपन कविता-


सावन की रिमझिम बूँदों-सा प्यारा बचपन बना रहे।

गोमुख निःसृत गंगाजल-सा पावन बचपन बना रहे।।


बच्चों की किलकारी को सुनने वाले मन,प्राण मिलें।

सहमे,सिकुड़े,भूखे,प्यासे हर बचपन को ही त्राण मिले।।


रंग-बिरंगे खेल-खिलौने घर-आँगन में बिखर पड़ें।

धूम-मचाते,खुशी लुटाते सबके बच्चे निखर पड़ें।।


बचपन बीते मधुर गीत-सा,जीवन भर जो याद रहे।

सुन्दर रंगों में पुष्पित हो,उपवन-सा आबाद रहे।।


बाल-गीत कवि-वृन्द लिखें,लेखनी सदा आह्लादित हो।

संगीत 'गीत'भर देगी उसमें,झूम-झूम आनन्दित हो।।


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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'

 मदिरा सवैया----नूतन-वर्ष 

 (7भगण211+गुरु)=22वर्ण)



नूतन-वर्ष विकास करे,

नव चेतनता नव भोर रहे।

पूनम चाँद दिखे नभ में,

ॠतु सावन भी चहुँ ओर रहे।

नाव चले तट से जब भी, भव-सागर में पर छोर रहे।

जीव-पतंग उड़े तब भी,

मधुसूदन के कर डोर रहे।।


ओस भरी जल हीर-कनी,

धरती पर अंकित शोभित हो।

कोष भरे सब नीरज भी,

खिल के महकें,मन मोहित हो।

बोल कहीं पिक के सुन के, बगिया अमिया सह पोषित हो।

साल नया सुख दे सबको,

अब निर्धन भी नहिं शोषित हो।


पावन-सी किरणें नित ही, 

थल में नव-जीवन डाल सकें। 

सावन के घट भी सज के,

धरती पर अंकुर पाल सकें।

दोहन कीअब बात न हो,

हर शोषित भी धन जोड़ सकें।

मोहन की मुरली सुन के,

ब्रज के यमुना-तट दौड़ सकें।


दारुण भीषण थी विपदा,अब तो प्रभु केवल तारण हो।

कारण तो हम ही सब थे,

पर हे!प्रभु ताप न मारण हो।

साल नया नव-यौवन दे,

फिर से उगना परती पर हो।

काल बुरा मिट जाए यहाँ,

सबका रहना धरती पर हो।।


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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'


 अनंद छंद -121  212  121  212  12  = 21 मात्राभार


14 - वर्णिक  चतुष्पदी


मयंक रात में कला निखारता  रहा।

चकोर चाँद की छटा निहारता रहा।

नदीश सीपियाँ गिरा बुहारता रहा।

हिमेश मोद से नदी उतारता रहा।।


शरारि व्योम को डरा पुकारती रही।

बहार रात से लिए गुजारती रही।

बटेर धूल को लगा उतारती रही।

खमाज राग 'गीत' भी सुधारती रही।।


मनोज झूम-झूम फूल तोलता रहा।

सरोज मीत चञ्चरीक खोलता रहा।

खद्योत रोशनी उड़ेल डोलता रहा।

जहान सो रहा प्रपात बोलता रहा।।


डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'


 मनहरण घनाक्षरी छंद

 [ शरद् पूर्णिमा ]


स्वर्णिम किरन सह,हँस रहा पूर्णचंद,

दमक रहे सितारे,रजनी धवल है।

हिलमिल-झिलमिल,लगे प्रभु के खिलौने।

नयनाभिराम सब,बिंबक नवल है।।


शीतल मदिर हवा,वन-उपवन फिरे,

रुपहली चाँदनी की,कान्ति भी उज्ज्वल है,

उमंग-तरंग लिये,यामिनी उल्लास भरे,

रीते-रीते मन में भी,खिलता कँवल है।।

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डॉ०श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'


 विधा -गीत - समीक्षार्थ


आये रे बादरा,छाये रे बादरा।

१.जी घनन घनन करे,

   री!नयन जलन भरे

  हिय पिय पिय ही रटे,

   बाजे रे दादरा।

   छाये रे बादरा।

2. तू पवन मगन रहे,

    देअगन गगन बहे।

    मन नभ तड़ित चमके।

    छलके सुपुरंदरा।

    छाये रे बादरा।।

३. प्रियतम गरजन सुनो,

    तन-मन लरजन गुनो,   

   धिन-धिन, धिक-धिक करे,

    गूँजे घट- कंदरा।

    आये रे बादरा।

 4. फल दल झरने लगे,

     नद जल भरने लगे,

     रज-कण सुमन महके,

     छोड़ो प्रिये तंद्रा।

     आये रे बादरा।।

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डॉ० श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'


 गीत - 16 मात्राभार


स ग प - | -  -  - - | ध नि  ध ध |प - - -|धप गरे नि - |   - -  - - | ध निध स -|धनिध सं निधप -|  

  मुकुलित कलियाँ डोल रही हैं,

  अतुलित मधुरस घोल रही हैं।

1.रंजित गंधित चन्दन वन है,

  सज्जित मज्जित नन्दन वन है।

  सौरभ मण्डित पुहुप वीथियाँ,

  गुम्फित बन्धन खोल रही हैं।।

  मुकलित कलियाँ डोल रही हैं,

 अतुलित मधुरस घोल रही हैं।

2.अम्बर शोभित रजत चंद्रिका,

   झंकृत करती उदधि तन्त्रिका।

   सरवर तीरे रत्न  सीपियाँ,

   मुक्ता मणियाँ तोल रही हैं।।

   मुकुलित कलियाँ डोल रही हैं।

  अतुलित मधुरस घोल रही हैं।

3.सागर गगन धरा जगमग है,

उज्ज्वल नवल धवल डगमग है।

  शीतल सरस मयङ्क कलाएँ

  मुखरित हो कुछ बोल रही हैं।।

  मुकुलित कलियाँ डोल रही हैं,

 अतुलित मधुरस घोल रही हैं।।

4.रजत रूप रजनी ने पाया,

झिलमिल जल तट तरुवर छाया

 मन्द पवन तन छूकर कहती ,

  प्रकृति सदा अनमोल रही है।।

 स ग प - | -  -  - - | ध नि  ध ध |प - - -|धप गरे नि - |   - -  - - | ध निध स -|धनिध सं निधप -|


डॉ० श्रीमती गीत मिश्रा 'गीत'


 ताटंक  छंद---16-14=30 अन्त में तीन गुरु


मन्दिर की मूरत से हमको,

मिलता एक सहारा है ।

अन्तर्ज्योति जलाकर देखो,

सारा जगत हमारा है। 

मानव की नासमझी करती,

आपस में बँटवारा है।

मन का भ्रम हम दूर करें तो,

जीवन सबसे प्यारा है।। 

निज घट ज्योति जलाए रखना,

प्रभु ही पालनहारा है।

है सबकी अनमोल धरोहर,

तम को इसने मारा है।।

भिन्न कहाँ है ऊपर वाला, 

भव से उसने तारा है। 

आत्मा में ही परमात्मा है,

सबने ही स्वीकारा है।।

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डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'


हरिगीतिका----मुक्तक  


 

मात्रा भार---       16,12

चरणान्त---1, 2


अब साल नूतन आ रहा है, 

मन मुदित हर दिन रहें।

पावन सभी की भावना हो,

नीतियाँ पल छिन रहें।

जीवन सफल सार्थक रहें सब,  धर्म धाराएँ बहें।

दीप घर-घर दर जलें,अब  नहीं सुख बिन रहें।।


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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'


 ॐ श्री गुरुवे नमः।



गुरु हैं युक्ति,गुरु हैं मुक्ति,

गुरु शिव शक्ति,गुरु हैं भक्ति।

गुरु हैं ब्रह्मा,गुरु हैं विष्णु,

गुरु हैं शंकर,गुरु हैं सहिष्णु।।

ऊँ श्री गुरुवे नमः।

गुरु हैं उपवेद,मंत्र ऋचाएँ,

चतुर्वेद सुश्री संहिताएँ।

धवल हिमालय,गुरु हैं गंगा,

गगन फहरता,हिन्द तिरंगा।।

ऊँ श्री गुरुवे नमः।

ज्ञान आकरम्,अद्भुत् सरलम्,     

पवित्र संगम,कृपालु हृदयम्।

परम ब्रह्म गुरु जगत् नियंता,

सत्य चित्तमय,आदि अनंता।।

ॐ श्री गुरुवे नमः।

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डॉ० गीता मिश्रा 'गीत' 


 दोहे - विषय - हिन्दी         


1.हिन्दी में सब ज्ञान है,हिन्दी अपना मान।

समझ हुई जब से मुझे,गाये हिन्दी गान।

2.सरल शुद्ध रस-खान है,लिपि वैज्ञानिक मीत।

अन्तर्मन की चाह है,रहे सदा ही प्रीत ॥

3.संस्कृत से निकली हुई,तत्सम् तद्भव साथ।

अलंकार रस छंद हैं,विविध विधाएँ हाथ॥

4.रवि समान हिन्दी लगे,ले आती है भोर।

अपनाओ जितना इसे,फैलेगी चहुँ ओर ।।

5.भारत की पहचान है,हम सबका सम्मान।

भारतमाता मानती,हिन्दी है अभिमान।।

6.एक राष्ट्रभाषा बने,दृढ़ हो भारत देश।

अपने में सम्पूर्ण है,हिन्दी का परिवेश।।

7.एक देश में एक ही,भाषा जग की रीति।

भारत ही पीछे रहा,लागू हो अब नीति।।

8.जीवन की हर दौड़ में,हिन्दी देती साथ।

सच्चाई के सामने,झुक जाता है माथ ॥

9.भाँति-भाँति की बोलियाँ, उपभाषा के चित्र।

आंचलिकशब्दावलियाँ,अपनाती बन मित्र।।

10.हिन्दी को भी विश्व में,शीघ्र मिले सम्मान,

अंग्रेजी लिख बोलकर,क्यों करते अपमान।।

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डॉ० श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'


 वन्दना गीत


स्थाई -

भारती का करें वन्दनम् वन्दनम्।

भाव सुमनों भरा अर्चनम् पूजन म्।।

1.ज्ञान दीपक तले बुद्धि ज्योतित जले,

स्नेह की आरती मन नयन में पले।।

दिव्य अविराम दर्शन हमें मातु दो, 

भक्तिमय उर में हो नन्दनम् नन्दनम्।।

भारती का करें वन्दनम् वन्दनम्।

भाव सुमनों भरा अर्चनम पूजन म।।

 2.धर्ममय सांस्कृतिक राह हो प्रज्ज्वलम्,

श्वेतअम्बर सदृश हो चरित उज्ज्वलम्।

शान्ति सद्भावना,नीति गुण प्रीति का,

भाल में हो लगा चन्दनम् चन्दनम्।।

भारती का करें वन्दनम् वन्दनम्।

भाव सुमनों भरा अर्चनम् पूजनम्।

3.ब्रह्ममय शब्द रसना में ब्रह्माणि हो,

वाङ्गमय अर्थ रचना में कल्याणि हो।

सप्तसुर मन के मन्दिर में झंकृत रहें,

शंख घंटी सदृश नन्दनम् नन्दनम्।।

भारती का करें वन्दनम् वन्दनम्।

भाव सुमनों भरा अर्चनम् पूजनम्।।


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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'


 घनाक्षरी --मात्रा भार---16

8  8  8  8=32

(सभी मात्राएँ लघु)एक प्रयोग 


नवल किरन सह,शशि निकसत जब,

तन मरकत मणि,सम दमकत सब।

मुख-पट सरकत,चमचम चमकत ,

विरह व्यथित मन,पल-पल तड़पत।।

इत-उत भटकत,प्रिय पग झटकत,

गिरत पड़त दर,उठत डगर पर।

अटपट गति लखि,पकड़त सुधिजन,

छिपत सदन मह,विहंसत परिजन।। 

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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'


 मुक्तक - ईश्वर से कामना है


दीपक जलें सभी घर,

तम से उबार देना,

पीड़ा न हो किसी उर,खुशियाँ अपार देना।

जीवन सुगम नहीं है,आगम- निगम हमारे !

डगमग भटक रहे हैं,भव से ही तार देना।।


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डॉ० श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'


 गीत - नववर्ष


स्थाई -

आया प्रथम नवमास डर-डर,

पाया मृदुल उपहास भर-भर।


अन्तरा -

मौसम ठिठुर-ठिठुर कर रहता,

शीतल लहर कहर सब सहता।

धुँध चदरिया ताने कहती,

यह कैसा नव वर्ष थर-थर।।


तुहिन गिराकर गगन रो रहा,

हिम पर्वत बस मगन सो रहा। झीलें नदी ताल जम जाते ,

जो गिरते बहते थे झर-झर।।


ठंडी हवा अकड़ कर बहती,

काँपी धरा सिकुड़ सब सहती

मुरझा रहीं प्रकृति की निधियाँ,

उपवन जीता है अब मर-मर।।


चैत्र माह मनभावन सबसे,

अलि!ऋतुराज आगमन जबसे।

कोंपल नईं खिलें वृन्तों पर,

साल नया परिवर्तन धर-धर।।

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डॉ० श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'


 गीत -आंग्ल नववर्ष


आंग्ल नववर्ष का स्वागत, जनवरी माह अभिनन्दन,

सकल शुभफल दे अभ्यागत, भजे मन राम रघुनन्दन।

1.सुरभि शीतलता देती हो, सुमन खिलके महकते हों,

सलिल सबको मिले निर्मल,

मेघ बरसा के कहते हों।।

हरित हों बाग वन उपवन,

रहे मन प्रमुदित मानव का।

भले ही शत्रु अहि लिपटें, 

बिखेरें गन्ध बन चन्दन।।

सकल शुभफल दे अभ्यागत, भजे मन राम रघुनन्दन।

2.जगत् में शान्ति हो सुख हो, भक्ति गीतों से हो रंजन,

रुदन स्वर कष्ट विपदा के, समापन कर दो दुःख भंजन।

प्रकृति के मुग्ध मनहर स्चर,

सुनें जन-जन सहज मन से।

पवन पल्लव विहग कलरव, 

सरल बचपन रुदन क्रन्दन।।

सकल शुभफल दे अभ्यागत, भजे मन राम रघुनन्दन। 

3.अखिल संसार घर-सा हो,

रहे जीवन भी मर्यादित,

निखिल अपनत्व ममता हो,

प्रेम गुण मन में आच्छादित,

मिटें सब भेद झगड़ों के,

परस्पर मैत्री सच्ची हो,

दया करुणा सदा उमड़े,

दिलों में धड़कन स्पन्दन।।

नवल सम्वत् का सुस्वागत,करें नववर्ष अभिनन्दन।

सकल शुभफल दे अभ्यागत, भजे मन राम रघुनन्दन।

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डॉ० श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'


 दीप+अवलि =दीपावलि

             [गीत ]

स्थाई -

दीप अवलि दमके।

हर घर आँगन,मन्दिर प्रांगन

जगमग पथ चमके।।

अन्तरा -

1.विपुल धरोहर,भू पर नभ पर,

झिलमिल हिलमिल रहें परस्पर। मनहर शुभ घड़ियाँ छाई हैं,

पवन चले थमके।

दीप अवलि दमके।


2.अन्तर्मन हिय पिय मोहित हैं

दीप-रश्मियाँ सह ज्योतित हैं।

छलक रहे घट प्रेम स्नेह से,

चीरे पट तमके।

दीप अवलि दमके ।।


3.धरती का रच गया स्वयंवर,

मुदित क्षितिज रत्नाकर अम्बर।

सरवर झरने तरनि-तरंगें,

मंगल स्वर छमके।

दीप अवलि दमके।।


4.देव सुरेश महेश प्रफुल्लित

कलिकाएँ मधुवन की मुकुलित।

रमा उमा ब्रह्माणी करतीं,

सुमन वृष्टि जमके।

दीप अवलि दमके।।

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डॉ० श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'


गीतिका


 शारदे! मैं गा सकूँ तुम कण्ठ दो संगीत का। 

छेड़ दो वीणा सुरों में राग गाऊँ प्रीत का।

तान लूँ,आलाप लूँ मैं या सुनाऊँ गीतिका।

पार नैया को लगा दो ज्ञान दे दो नीति का।

आरती करती रहूँ नित माँ मुझे वरदान दो।

गीत नूतन ही रचूँ,मेधा प्रखर धी दान दो।

साधना पूरी करूँ मैं शारदे संगीत दो।

भावना मेरी सुनो माँ !'गीत'को भी गीत दो।।


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डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'


 गीत -  शीत ऋतु


शीतल सुरभि सुगन्धित पल- पल,

कोमल कुसुम नमित हैं फल दल।।


पवन विटप सह उलझ बही है,

धवन धरा सब समझ रही है।

तुहिन कणों को हिला-हिला कर,

पावन मन में करती हलचल।।


शीतल सुरभि सुगन्धित पल- पल।

कोमल कुसुम नमित हुए फल दल।।


गगन हवन कर धुंध बनाता,

क्षितिज दिशा को छिपा मनाता।

ओझल किरणें व्याकुल नभ पर,

चीरें सतत श्वेत पट ढल-ढल।।


शीतल सुरभि सुगन्धित पल- पल।

कोमल कुसुम नमित हुए फल दल।।


हरित प्रांत श्वेताभ बने हैं,

शिखर बर्फ़ से ढके तने हैं।

घाट घाटियाँ नदी वादियाँ,

एक रंग भासित नभ-जल- थल।।


शीतल सुरभि सुगन्धित पल- पल।

कोमल कुसुम नमित हुए फल दल।।


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डॉ० गीता मिश्रा 'गीत'


 वसंत पर दो दोहे


मन-आंगन प्रमुदित हुआ,हलचल करता कौन।

वासन्ती परिधान में,चला आ रहा मौन।।


सुमन-वाण ले हाथ में,भेद रहा सबओर।

कामदेव के रूप में,है वसन्त का शोर ।।


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डॉ० श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'


 मुक्तक -


कौन कौस्तुभ कान्ति कुल भूषण कृपानिधान हैं,

अवनि अम्बर अम्बु अमृत अनिल आदि विधान हैं।

राम राघव राज्ञ रघुनन्दन सियापति राम हैं,

पूर्ण पावन प्रेम पथ पोषक प्रणम्य प्रधान हैं।।


डॉ० गीता मिश्रा 'गीत'


 गीत - धर्म-दीपक


स्थायी -

धर्म दीपक जल उठें, जन-मन जगाने के लिए।

अन्तरा -

1.दीन दुखियों का सहारा बन सकें प्रभु शक्ति दो,

गीत गा भजते रहें दिन-रात ऐसी भक्ति दो।

राम धुन सुन,राम-पथ चुन,तम भ्रम भगाने के लिए।।

धर्म दीपक जल उठें,जन-मन जगाने के लिए।

2.प्रेम करुणा भाईचारा का सुखद व्यवहार हो,

राग रंजिश द्वेष कटुता भाव का संहार हो,

शुद्ध निश्छल घट रहे,प्रभु में लगाने के लिए।

धर्म दीपक जल उठें,जन-मन जगाने के लिए।।

3.विश्व के कल्याण की फलती रहे सद्भावना,

नष्ट कर दो जड़ सहित उर में पली दुर्भावना, 

मूल बन कर दो सहारा फल उगाने के लिए।।

धर्म दीपक जल उठें,जन-मन जगाने के लिए।


-डॉ० गीता मिश्रा 'गीत'



 

आओ!पर्वत सेऊँचाई ले लें,

दिल में सागर-सी गहराई ले लें। 

धरती से सर्वस्व लुटाना सीखें,

मानव हैं मन में मानवता ले लें।


पावन नाम जग में राम  का ही है,

मनभावन स्याम नाम कम नहीं है।

धाम वृन्दावन या धाम अयोध्या, 

बरसाता जीवन में सावन ही है।


डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'

 

नमन भावों के मोती 🙂👏🏼

विषय-प्रकाश


1.आदि देव पर ही टिकी,जीव-जगत की आश।
बिन उसके ब्रह्माण्ड में, होता नहीं  प्रकाश।।
2.अन्तर्मन ज्योतित रहे,सब ज्योतित हो जाए।
लौ उमंग की जब बढ़े,प्रभु-प्रकाश मिल जाए।।
स्वरचित
डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'

 रघुवर चले अवध की ओर।


मंगल कलश सजे घर द्वारे,

करतल शंख बजे,उर गा रे।

ऋद्धि सिद्धि शुभ लाभ सगुन लखि,

गद्गद झुके नयन कर जोर।।


सरयू सलिल अनिल आनन्दित,

उमड़ी घटा जलाभिषेक हित।

नभ से सुमन गिराएँ हरि हर,

छाई सखी सुहानी भोर।।


सकल भुवन श्रीराम समर्पित,

जन-मन गुण गौरव सुन दर्पित।

शहनाई दुँदुभी नगाड़े,

करते प्रतिपल भाव विभोर।।


रघुवर चले अवध की ओर।

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डॉ० गीता मिश्रा 'गीत'


 मनहरण घनाक्षरी


गंगाजल संग घोली,गंधित चन्दन रोली,

अक्षत सुमन धूप,दीपक जलाऊँगी।

ओढ़ पट पीत रंग,भाल कुमकुम संग,

तुलसीदल श्रीफल,प्रेम से खिलाऊँगी।

राम नाम बोल-बोल,आनन्द में डोल-डोल,

चरणामृत घोल-घोल,भक्तों को पिलाऊँगी,

जप तप नाम ध्यान,सिद्धि योग आत्मज्ञान,

व्रत उपवास रख,राम से मिलाउँगी।।


- डॉ० गीता मिश्रा 'गीत'



     मन की बात


मन की बातें जिससे कह दें,        क्यों धोखेबाज निकलते हैं?

विश्वास करें जब भी जिसपर,

क्यों वे गद्दार निकलते हैं?


सम्मुख मीठा-मीठा बोलें,

पीछे षड्यन्त्र चलाते हैं।

कुटिल चाल,झूठे वचनों से

अपनों को खूब सताते हैं।।


कुछ चाटुकारिता,छल-बल से

सच कहने में ही अटक रहे।

अपने को सबकुछ समझ रहे,

बस स्वार्थ-लाभ में भटक रहे।।


अच्छे को अच्छा कहने में,            कब,कहाँ बुराई होती है?

यदि करें प्रशंसा औरों की,

 तो नहीं हँसाई होती है।।


टेढ़ा आँगन उसका होता,

जो नाच नहीं कर पाता है।

वो खाली ढोल बजाता है,

आधी गागर छलकाता है।।


मन से,वचनों से,कर्मों से,

दिल में कड़वाहट उचित नहीं।

कथनी-करनी का भेद जानते,

इतने भी हम भ्रमित नहीं।।

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      डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'

  सुहानी-सुबह             कविता 1. रँग में अपने रंग दिया, रवि ने सुबह से ही गगन। देख नभ की अरुणिमा को, चारों दिशाएँ भी मगन।। 2.लालिमा भी प्य...