सुहानी-सुबह
कविता
1. रँग में अपने रंग दिया,
रवि ने सुबह से ही गगन।
देख नभ की अरुणिमा को,
चारों दिशाएँ भी मगन।।
2.लालिमा भी प्यार से,
उन बादलों पर छा गई थी।
दूर अपनों से छिटक,
जिनमें उदासीआ गई थी।।
3.जागते फिर फड़फड़ाते,
पक्षियों के पंख तरु पर।
करने लगे कलरव कहीं,
क्रन्दन फुदककर डाल पर।।
4.गुनगुनाते भँवर,तितली-
खोलती हैं पंख कोमल।
डाल में छिप गा रही,
पंचम सुरों में कुहुक कोयल।।
5.फूल-सी माँ खिलखिलाकर,
खोलतीं घर द्वार आँगन।
फिर चलीं निज बाल-कलियों
को सुनाने गीत-गायन।।
6.वन,बाग,उपवन,वाटिका,
गुंजित हुईं सब घाटियाँ
वीणा बजाकर पवन ने,
झंकृत करीं सब वादियाँ।।
7.छिड़ गया संगीत अनुपम,
इस धरा से उस गगन तक।
चल पड़ा जीवन अनोखा,
सुरमयी सुबह से शाम तक।।
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डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत'
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