Monday, 4 March 2024

 गीता छंद---मात्रा भार 14  12=26


अधरोष्ठ द्वय सरसिज सदृश, कोमल चटख रक्ताभ।

कटि करधनी झिलमिलाती,

रुनझुन वलय श्वेताभ।

स्याम-तन पर पीत अम्बर ,

ज्यों नील सर पीताभ।

कमनीय अद्भुत् कृष्ण छवि,

 लोचन जलज नीलाभ।।


------×××× - - - 


    डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत'


No comments:

Post a Comment

  सुहानी-सुबह             कविता 1. रँग में अपने रंग दिया, रवि ने सुबह से ही गगन। देख नभ की अरुणिमा को, चारों दिशाएँ भी मगन।। 2.लालिमा भी प्य...