दोहे - कलयुगी भटका मानव
अकर्मण्य है आलसी,माँगे छप्पन भोग।
केवल अपना 1 ध्यान है,तब भी लगते रोग।।
जीवन में भटके सदा,घर से जाता भाग।
पर नारी को मानता,अपनी लगती नाग।।
कथनी करनी हैअलग,छल बल हैं हथियार।
रख घमण्ड धनराशि का,लड़ने को तैयार।।
शतरंजी चालें चले, गिरी हुई है सोच।
बात-बात पर झटकता,कब आएगी लोच।।
मीठी बातों में फँसा,कर देता मजबूर।
निज उल्लू सीधा करे,फिर कर देता दूर।।
जाल बिछाकर फाँसता,छिपकर करता वार।
ऐसा मानव कलयुगी,बना धरा पर भार।।
डॉ०श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
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