दोहा -
नहीं चाहते अधर भी, निकलें घट के बोल।
मुखरित होते ही कहीं, खुल जाये ना पोल।।
डॉ० गीता मिश्रा 'गीत'
सुहानी-सुबह कविता 1. रँग में अपने रंग दिया, रवि ने सुबह से ही गगन। देख नभ की अरुणिमा को, चारों दिशाएँ भी मगन।। 2.लालिमा भी प्य...
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