Thursday, 9 January 2020

नव- वर्ष(जागरण-गीत)

नव- वर्ष(जागरण-गीत)
नव-वर्ष आ गया है,
नींद से जगा रहा।
देश-प्रेमियों को फिर,
नया सबक़ सिखा रहा।
ये चेतना का वर्ष हो,
ये जागृति का वर्ष हो।
आतंक के विरुद्ध,
जंग जीतने का वर्ष हो।
प्रचंड रौद्र रूप हौं,
जीत के ही गीत हौं।
जो दस को मारकर मिटें,
ऐसे देश-वीर हौं।
रक्त में उबाल हो,
नसों में तेज धार हो।
जान देने के ज़ुनून
की बड़ी कतार हो। '


'पंचजन्य' फिर बजे,
दिशाएँ गूँजने लगें।
'गांडीव' कान तक तने,
डंका युद्ध का बजे।
हुँकार से,दहाड़ से,
खड्ग के प्रहार से।
आतंकी मुँड काट दो
जो 'पाक' में ही जा गिरें
बन्दूक से भी दनदनाती
गोलियाँ निकल पड़ें।

निशाना तोप से लगे,
गगन से बम बरस पड़ें।
माँ को छूने,छीनने की
'पाक' -चाल नष्ट हो।
कश्मीरवासियों को ओह!
अब न कोई कष्ट हो।
तैयार पूरा देश हो,
लहू में पूरा जोश हो।

उठो,बढ़ो,मरो -मिटो
आतंकियों पे रोष हो।
सत्य की विजय लिए,
'तिरंगा' फरफराता हो।
आतंक का सफाया देख,
'हिन्द' लहलहाता हो।'

--डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा (1-1-2017)

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