Thursday, 9 January 2020

वासन्ती महारास

होलिकोत्सव पर समर्पित चन्द पंक्तियाँ-----
मानवीकरण द्वारा होली,दिशा,धरा,पवन का, वसन्त के साथ होली खेलने का चित्रण है ।अन्त में होली तथा महारास की धूम सब कृष्णमय हो गई।'श्रीकृष्णःशरणम् मम्'।

वासन्ती महारास
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ऋतुराज 'वसंत' उमंग लिए
मदमस्त 'पवन' संग झूम रहे,
यह देख जली,मचली 'होली'
लेकर आई कुछ रंग नए।।

पिचकारी रंग-भरी मारी,
कोमल 'वसंत' तिलमिला गए।
जब रंग गुलाल मला गालों पर,
प्रिय 'वसंत' खिलखिला गए।।

फिर झूम-झूम,कुछ घूम-घूम,
कुछ महक-महक आ गई 'दिशा'
'होली-वसन्त' का मिलन देख,
अकुलाई कुछ बलखाई 'दिशा'।।

मुरली,मृदंग,ढप, ढोल बजे,
शहनाई बजी यमुना-तीरे।
रच गया रास,छिड़ गया फाग,
रंग-स्याम चढ़ा धीरे-धीरे ।।

दुल्हन-सा सब श्रृंगार किए,
'धरती' भी अब रंगीन हुई।
फिर महारास की धूम मची,
'कान्हा' में ही तल्लीन हुई।।

ये 'पिय-वसंत' ही 'कान्हा' है,
वासन्ती-रंग 'व्रजबाला है'।
होलिका पवन' संग'धरा','दिशा',
हर गोपी देवी-बाला है।।

आओ!हम भी सप्त रंगों से,
होली का त्यौहार मनाएँ।
सुमनों की बौछार करें,
सब 'कृष्ण'-प्रेम में खो जाएँ।।

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डाॅ0(श्रीमती)गीता मिश्रा
रचना-तिथि-15.3.2019

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