आजकल कहीं बर्फ की चादर है तो कहीं कोहरे की।
धरती पर कोहरा छाया देखकर कुछ यथार्थ व काल्पनिक भाव इस तरह जगे कि सूर्य व धरा का मानवीकरण कर बैठे।
आभारी रहूँगी आपके वाचन की।
धरती पर कोहरा छाया देखकर कुछ यथार्थ व काल्पनिक भाव इस तरह जगे कि सूर्य व धरा का मानवीकरण कर बैठे।
आभारी रहूँगी आपके वाचन की।
धुँध वाली धरती
धुंध-चादर,हरित-तन पर,
करके अवगुंठन-वदन पर
सरसराती,मदमदाती,
धवल नभ तक छिपछिपाती,
धरती मानो पग बढ़ाये,
चल पड़ी सूरज से मिलने।।
करके अवगुंठन-वदन पर
सरसराती,मदमदाती,
धवल नभ तक छिपछिपाती,
धरती मानो पग बढ़ाये,
चल पड़ी सूरज से मिलने।।
भीगा-भीगा श्वेत अम्बर,
झीना-झीना पट पहनकर,
प्रेम-पूरित गीत गाती-
हौले-हौले गुनगुनाकर,
धरती जैसे पग बढ़ाये-
चल पड़ी सूरज से मिलने।।
झीना-झीना पट पहनकर,
प्रेम-पूरित गीत गाती-
हौले-हौले गुनगुनाकर,
धरती जैसे पग बढ़ाये-
चल पड़ी सूरज से मिलने।।
पथ में उलझी अटपटी-सी,
सहमी-सहमी,अटकती-सी,
सोचती, पलकें झुकाती,
जानें क्यों फिर-फिर लजाती?
धरती अब भी पग बढ़ाये,
चल रही सूरज से मिलने।।
सहमी-सहमी,अटकती-सी,
सोचती, पलकें झुकाती,
जानें क्यों फिर-फिर लजाती?
धरती अब भी पग बढ़ाये,
चल रही सूरज से मिलने।।
रवि को नभ पर ही मनाने,
साथ हँसने-मुस्कुराने,
गर्म किरणों में मचलकर,
अनावरण अपना करवाने,
धरती सचमुच पग बढ़ाये,
चल रही सूरज से मिलने।।
साथ हँसने-मुस्कुराने,
गर्म किरणों में मचलकर,
अनावरण अपना करवाने,
धरती सचमुच पग बढ़ाये,
चल रही सूरज से मिलने।।
धुंध में लिपटी धरा को-
देख, पीड़ा-मुक्त करने,
डालकर निज कर-निकर,
रवि भी चला कोहरा हटाने।।
अब ये दोनों पग बढ़ाये,
चल रहे आपस में मिलने।।
देख, पीड़ा-मुक्त करने,
डालकर निज कर-निकर,
रवि भी चला कोहरा हटाने।।
अब ये दोनों पग बढ़ाये,
चल रहे आपस में मिलने।।
देखकर परिदृश्य अनुपम,
विश्व-जन प्रमुदित हुए,
अद्भुत,अलौकिक मिलन से,
सब काम भूतल पर हुए।।
आओ!चलें हम भी सदा-
सहयोग से सद्भाव से,
वसुधा-रवि जैसे मिले,
परमार्थ-हित नि:स्वार्थ से।।
डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत'
रचना-तिथि---28.12.19
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