Thursday, 9 January 2020

आकाश मन का चाहती हूँ

सांसारिक बन्धनों में व्यक्ति इस तरह फँसा हुआ है कि चाहते हुए भी उससे बाहर निकल नहीं पा रहा है।प्रकृति की गोद में ही पल रहा है पर उसकी महत्ता से अनभिज्ञ है।उसका सौन्दर्य-लाभ तक नही ले पा रहा है।मन की इसी धारणा ने चन्द पंक्तियों का सृजन किया----------

आकाश मन का चाहती हूँ

1.मोह-माया-जाल से अब दूर जाना चाहती हूँ,
मुक्त होकर उड़ सकूँ, आकाश मन का चाहती हूँ।।

2.कुदरती रंगों में रँगना और सँवरना चाहती हूँ,
उदित रवि की लालिमा से,मैं उलझना चाहती हूँ।।

3.मधुर किसलय,सुमन-सौरभ-संग खिलना चाहती हूँ,
चटखती,इतराती कलियाँ देख,हँसना चाहती हूँ।।

4.ओस की मौक्तिक चमक से खेलना मैं चाहती हूँ,
झूमती फसलों में लहराकर, मचलना चाहती हूँ।।

5.स्वर मिला,खग-वृन्द-संग,सरगम सुनाना चाहती हूँ,
पक्षियों के झुँड में,मैं भी फुदकना चाहती हूँ।।

6.पंचम स्वरों की मल्लिका का गीत सुनना चाहती हूँ,
डाल मैं छिप,पिक-सदृश,मैं भी कुहुकना चाहती हूँ।।

7.प्रकृति का अनुपम खजाना, लूटना मैं चाहती हूँ,
चुपचाप,लुक-छिप,दिव्य,अद्भुत लाभ लेना चाहती हूँ।।

-----डाॅo गीता मिश्रा 'गीत'
रचना-तिथि---7.10.2019

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