20-12-16 में लिखी पंक्तियाँ आज प्रेषित कर रही हूँ।प्रातःकाल भ्रमण के दौरान, उदय होते सूर्य के साथ-साथ आये परिवर्तन को देखकर कुछ लिखे बिना नहीं रह सकी।
सुहानी-सुबह
1.रंग में अपने रंग दिया,
रवि ने, सुबह से ही गगन।
देख नभ की अरुणिमा,
हो गई दिशाएँ भी मगन।।
रवि ने, सुबह से ही गगन।
देख नभ की अरुणिमा,
हो गई दिशाएँ भी मगन।।
2.लालिमा भी प्यार से,
उन बादलों पर छा गई थी।
दूर अपनों से छिटक,
जिनमें उदासी आ गई थी।।
उन बादलों पर छा गई थी।
दूर अपनों से छिटक,
जिनमें उदासी आ गई थी।।
3.जागते, फिर फड़फड़ाते,
पक्षियों के पंख, तरु पर।
करने लगे कलरव कहीं,
क्रन्दन कहीं, हर डाल पर।।
पक्षियों के पंख, तरु पर।
करने लगे कलरव कहीं,
क्रन्दन कहीं, हर डाल पर।।
4.गुनगुनाते भँवर,
तितली खोलती हैं पंख कोमल।
डाल में छिप, गा रही,
पंचम सुरों में स्याम-कोयल।।
तितली खोलती हैं पंख कोमल।
डाल में छिप, गा रही,
पंचम सुरों में स्याम-कोयल।।
5.फूल-सी माँ खिलखिला कर,
खोलती घर,द्वार,आँगन,
फिर चलीं,निज बाल-कलियों
को सुनाने गीत-गायन।।
खोलती घर,द्वार,आँगन,
फिर चलीं,निज बाल-कलियों
को सुनाने गीत-गायन।।
6.वन,बाग,उपवन,वाटिका,
गुंजित हुईं सब घाटियाँ
वीणा बजाकर पवन ने,
झंकृत करीं सब वादियाँ।।
गुंजित हुईं सब घाटियाँ
वीणा बजाकर पवन ने,
झंकृत करीं सब वादियाँ।।
7.छिड़ गया संगीत अनुपम,
इस धरा से उस गगन तक।
चल पड़ा जीवन अनोखा,
सुरमयीसुबह से, शाम तक।।
इस धरा से उस गगन तक।
चल पड़ा जीवन अनोखा,
सुरमयीसुबह से, शाम तक।।
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‐--डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत'
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