याचना
ओ सावन-मनभावन मेघा! जन-जन-मन पावन कर दे।
वसुधा के अँचल को जल से, हरा-भरा निर्मल कर दे।।
तू गरज मगर उतना ही गरज, तेरी गर्जन 'जयगान' लगे।
तू बरस यहाँ उतना ही बरस,
धरती को जितनी प्यास लगे।
मत 'फट पड़ना' तू अपनों पर,
जो तेरी राह निहार रहे।
तेरी जलधाराओं से ही,
जो जीवन यहाँ गुजार रहे।।
तेरा विधान'परहित' का है,
अपनी मनमानी मत करना।
हो मन में कितनी उमड़-घुमड़,
सीमा-उल्लंघन ना करना।।
ग़र रौद्र-रूप तेरा होगा,
सब उथल-पुथल मच जाएगी।
आर्त्त-नाद,क्रंन्दन-स्वर से,
धरती कंपित हो जाएगी।।
तेरे तांडव-नर्तन से तो,
हर दिशा यहाँ थर्राएगी।
अतिवृष्टि,बाढ़,भू-कंपन से,
जल-मग्न धरा हो जाएगी।।
याचना यही तुझसे मेरी,
भू का नूतन श्रृंगार रहे।
सम्पूर्ण विश्व के अधरों पर,
नित मन्द,मधुर,मुस्कान रहे।।
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डाॅ0 (श्रीमती) गीता मिश्रा
रचना-तिथि--25.7.2018
ओ सावन-मनभावन मेघा! जन-जन-मन पावन कर दे।
वसुधा के अँचल को जल से, हरा-भरा निर्मल कर दे।।
तू गरज मगर उतना ही गरज, तेरी गर्जन 'जयगान' लगे।
तू बरस यहाँ उतना ही बरस,
धरती को जितनी प्यास लगे।
मत 'फट पड़ना' तू अपनों पर,
जो तेरी राह निहार रहे।
तेरी जलधाराओं से ही,
जो जीवन यहाँ गुजार रहे।।
तेरा विधान'परहित' का है,
अपनी मनमानी मत करना।
हो मन में कितनी उमड़-घुमड़,
सीमा-उल्लंघन ना करना।।
ग़र रौद्र-रूप तेरा होगा,
सब उथल-पुथल मच जाएगी।
आर्त्त-नाद,क्रंन्दन-स्वर से,
धरती कंपित हो जाएगी।।
तेरे तांडव-नर्तन से तो,
हर दिशा यहाँ थर्राएगी।
अतिवृष्टि,बाढ़,भू-कंपन से,
जल-मग्न धरा हो जाएगी।।
याचना यही तुझसे मेरी,
भू का नूतन श्रृंगार रहे।
सम्पूर्ण विश्व के अधरों पर,
नित मन्द,मधुर,मुस्कान रहे।।
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डाॅ0 (श्रीमती) गीता मिश्रा
रचना-तिथि--25.7.2018
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