हिन्दी सप्ताह,हिन्दी दिवस,हिन्दी पखवाड़ा और हिन्दी माह।हर साल की तरह सितम्बर माह में तरह-तरह के आयोजन हर वर्ष होते आ रहे हैं परन्तु हिन्दी की स्थिति आज भी वैसी ही दयनीय है।वर्ष 2000 में जो कविता लिखी थी आज भी वो
प्रासंगिक लगती है क्योंकि हिन्दी को आज भी वो सम्मान नहीं मिल पाया जिसकी वो अधिकारी है। कविता में हिन्दी
की दयनीय स्थिति की संगति
सीताजी से बैठाई है।
प्रासंगिक लगती है क्योंकि हिन्दी को आज भी वो सम्मान नहीं मिल पाया जिसकी वो अधिकारी है। कविता में हिन्दी
की दयनीय स्थिति की संगति
सीताजी से बैठाई है।
मैं हिन्दी हूँ
वर्षों से शोषित
अधिकार -वंचिता
निष्कासितअपनों से
परित्यक्ता'सीता'-सी
मैं हिंदी हूँ।
अंग्रेज़ियत की रावण-भुजा द्वारा घसीटी जाती--अपहृत नारी-सी,चीखती-चिल्लाती,
रोती विलखती
सिमट कर, देहरी पर
लज्जा बचाती,
मैं हिन्दी हूँ।
रोती विलखती
सिमट कर, देहरी पर
लज्जा बचाती,
मैं हिन्दी हूँ।
अपने ही देश में,
अपनों के बीच में,
शंकित दृष्टियों में,
उठती उँगलियों में
अपमानित,लज्जित
अग्नि-परीक्षा देकर
मर्यादा बचाती,
मैं हिंदी हूँ।
अपनों के बीच में,
शंकित दृष्टियों में,
उठती उँगलियों में
अपमानित,लज्जित
अग्नि-परीक्षा देकर
मर्यादा बचाती,
मैं हिंदी हूँ।
और अब शरणांगतवत्सल
वाल्मीकि-सदृश
चन्द लोगों के मन-आश्रम में अस्मिता छिपाए,
संस्कृति बचाए
हिन्दुस्तान की 'आत्मा'
हिन्द का 'प्राण'-
स्व-अस्तित्व को, पालती-पोषती,
मैं हिन्दी हूँ।
वाल्मीकि-सदृश
चन्द लोगों के मन-आश्रम में अस्मिता छिपाए,
संस्कृति बचाए
हिन्दुस्तान की 'आत्मा'
हिन्द का 'प्राण'-
स्व-अस्तित्व को, पालती-पोषती,
मैं हिन्दी हूँ।
घोषित 'रानी','राजरानी'
कागजी सिंहासन की,
लेकिन
एकाकी,विरह-दग्धा,
शोक से पागल,
विषमताओं से घिरी,
फिर भी आशान्वित -
आँग्लभाषा से अधिक
सम्मान पाने को तरसती
मैं हिन्दी हूँ।
कागजी सिंहासन की,
लेकिन
एकाकी,विरह-दग्धा,
शोक से पागल,
विषमताओं से घिरी,
फिर भी आशान्वित -
आँग्लभाषा से अधिक
सम्मान पाने को तरसती
मैं हिन्दी हूँ।
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डाॅ0 गीता मिश्रा 'गीत'
प्रकाशित--स्मारिका -सहस्राब्दी अखिल भारतीय राजभाषा संगोष्ठी,भुवनेश्वर 18.अक्टूबर 2000।
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