Thursday, 9 January 2020

चाह

चाह

राष्ट्र की एकता के स्वर बजाकर गीत गाऊँ मैं।
धरा से प्रेम करने की
मधुर सरगम सुनाऊँ मैं।।

देश ही राग,देश आलाप,
देश ही तान सप्त-सुर में।
तराना छेड़ दूँ ऐसा कि
भर दूँ जोश जन-जन में।।


झेलना चाहती मैं, यातनाएँ उन शहीदों की।
जो हँसकर काट देते थे-
'सज़ाए मौत' जीवन की।।


उढ़ाकर ओढ़नी माँ को हरी, धानी या बासंती,
बनाना चाहती हूँ
हर चमन की डाल रसवंती।।


पहनकर केसरी धोती
बनी जो शुद्ध खादी की
झूलना चाहती काँटों भरी
सूली भगत सिंह की।।


उठाकर खड्ग,बरछी,ढाल राणा और रानी के।
मिटाना चाहती अन्याय, शोषण,भेद वसुधा के।।
भुलाकर प्रान्त,भाषा,
रंग की असमानता सारी।
मिलाना चाहती हूँ संस्कृति
चारों दिशाओं की।।


तिरंगा हाथ में ऊँचा उठाकर
शान- से जग में।
यूँ ही बलिदान होना चाहती अपने व़तन पर।।
9.ये भारत है शहीदों का
यहाँ बलिदान वीरों का।
करूँ अर्पण रक्त,तन-मन,
नमन शत-शत कोटि वन्दन।।


-----------डाॅ0 गीता मिश्रा
(राष्ट्र के नाम समर्पित चन्द पंक्तियाँ)

No comments:

Post a Comment

  सुहानी-सुबह             कविता 1. रँग में अपने रंग दिया, रवि ने सुबह से ही गगन। देख नभ की अरुणिमा को, चारों दिशाएँ भी मगन।। 2.लालिमा भी प्य...