वसन्त-ऋतु के आगमन पर एक सखि अपनी प्रिय सहेली से कहती है--'एक काले भ्रमर ने गुनगुनाकर वसन्त-आगमन का सन्देश दिया और उसके रूप-सौन्दर्य का ऐसा वर्णन किया कि मेरा तन-मन भी वासन्ती हो गया।
वसन्त-आगमन
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वसन्त-आगमन
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सखि-कथन----
सखि!स्याम-मधुप,आ,पास मेरे,
गुन-गुन करता मँडराने लगा।
फिर कंत-वसंत के आवन का,
संदेशा रसिक! सुनाने लगा।।
गुन-गुन करता मँडराने लगा।
फिर कंत-वसंत के आवन का,
संदेशा रसिक! सुनाने लगा।।
भ्रमर-कथन----
सुकुमार वसंत का रूप नवल,
है पूर्ण चन्द्र,चाँदनी धवल।
मौक्तिक तारे झिलमिला रहे
पर्वत,घाटी खिलखिला रहे।।
है पूर्ण चन्द्र,चाँदनी धवल।
मौक्तिक तारे झिलमिला रहे
पर्वत,घाटी खिलखिला रहे।।
अब हुई सुबह,सिंदूरी-सी ,
हरियाली,हरित मखमली-सी,
पीले -पीले खेतों ने कर दी,
वासन्ती काया,वसुधा की।।
हरियाली,हरित मखमली-सी,
पीले -पीले खेतों ने कर दी,
वासन्ती काया,वसुधा की।।
हैं झूम रहे सब पीत-सुमन,
प्यासे भँवरे करते गुंजन,
हौले-हौले मृदु गीत सुना,
पालना झुलाती मस्त-पवन।।
प्यासे भँवरे करते गुंजन,
हौले-हौले मृदु गीत सुना,
पालना झुलाती मस्त-पवन।।
कलियाँ भी लुक-छिप झाँक रहीं
खिलने का बहाना ढूँढ रहीं।
रंगीन तितलियाँ देख-देख,
बचपन का आनन्द उठा रहीं।।
खिलने का बहाना ढूँढ रहीं।
रंगीन तितलियाँ देख-देख,
बचपन का आनन्द उठा रहीं।।
फूलों से सजी, हर डाल लदी,
वन-उपवन मधुर बयार चली।
सब चंचल हैं-सर,ताल,नदी,
निर्झर-जल-सरस फुहार चली।।
वन-उपवन मधुर बयार चली।
सब चंचल हैं-सर,ताल,नदी,
निर्झर-जल-सरस फुहार चली।।
लो उठी हूक! कोयल बोली,
बावली! अभी तक है भोली।
'कुहुक' रही पंचम स्वर में,
मतवाली अमुआ पर डोली।।
बावली! अभी तक है भोली।
'कुहुक' रही पंचम स्वर में,
मतवाली अमुआ पर डोली।।
सखि-कथन---
रस,रूप,गन्ध का लोभी अलि!
उड़ चला,जिधर थे सुमन-वृन्द,
मेरा मन वासन्ती करके,
पी रहा वहाँ,सुमधुर-मकरन्द।।
उड़ चला,जिधर थे सुमन-वृन्द,
मेरा मन वासन्ती करके,
पी रहा वहाँ,सुमधुर-मकरन्द।।
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डाॅ0(श्रीमती)गीता मिश्रा
रचना-तिथि---6.2.2019
रचना-तिथि---6.2.2019
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