Thursday, 9 January 2020

सखि-कथन

वसन्त-ऋतु के आगमन पर एक सखि अपनी प्रिय सहेली से कहती है--'एक काले भ्रमर ने गुनगुनाकर वसन्त-आगमन का सन्देश दिया और उसके रूप-सौन्दर्य का ऐसा वर्णन किया कि मेरा तन-मन भी वासन्ती हो गया।
वसन्त-आगमन
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सखि-कथन----
सखि!स्याम-मधुप,आ,पास मेरे,
गुन-गुन करता मँडराने लगा।
फिर कंत-वसंत के आवन का,
संदेशा रसिक! सुनाने लगा।।

भ्रमर-कथन----
सुकुमार वसंत का रूप नवल,
है पूर्ण चन्द्र,चाँदनी धवल।
मौक्तिक तारे झिलमिला रहे
पर्वत,घाटी खिलखिला रहे।।

अब हुई सुबह,सिंदूरी-सी ,
हरियाली,हरित मखमली-सी,
पीले -पीले खेतों ने कर दी,
वासन्ती काया,वसुधा की।।

हैं झूम रहे सब पीत-सुमन,
प्यासे भँवरे करते गुंजन,
हौले-हौले मृदु गीत सुना,
पालना झुलाती मस्त-पवन।।

कलियाँ भी लुक-छिप झाँक रहीं
खिलने का बहाना ढूँढ रहीं।
रंगीन तितलियाँ देख-देख,
बचपन का आनन्द उठा रहीं।।

फूलों से सजी, हर डाल लदी,
वन-उपवन मधुर बयार चली।
सब चंचल हैं-सर,ताल,नदी,
निर्झर-जल-सरस फुहार चली।।

लो उठी हूक! कोयल बोली,
बावली! अभी तक है भोली।
'कुहुक' रही पंचम स्वर में,
मतवाली अमुआ पर डोली।।
सखि-कथन---
रस,रूप,गन्ध का लोभी अलि!
उड़ चला,जिधर थे सुमन-वृन्द,
मेरा मन वासन्ती करके,
पी रहा वहाँ,सुमधुर-मकरन्द।।

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डाॅ0(श्रीमती)गीता मिश्रा
रचना-तिथि---6.2.2019

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