छवि निरखत,बाँकी चितवन कर गौरा मोह रही भोले को।
लास-नृत्य करते-करते शिव देख रहे जगदम्बे को।
ता थेइ थेइ तत् थाप पगों से,रचें अंग-मुद्राओं को।
देख मुदित हैं शिव-शंङ्कर,गिरिजा की काम-कलाओं को।।
डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखण्ड)
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