नवाक्षरावृत्ति----211-122-122
माँ मधुर वीणा दिखा दो,
राग दरबारी सिखा दो।
गान अपना बोल दो माँ,
तान अपनी खोल दो माँ।
गीत सबको प्रीत देगा,
राग मन को जीत लेगा।
वेद तुमने ही रचाए,
भेद सबसे ही छिपाए।
हो नमन पद्मासिनी का,
हो भजन हँसासिनी का।।
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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखण्ड)
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