Wednesday, 2 December 2020

मनहर घनाक्षरी

  

मनहर घनाक्षरी---8 8 8 7समीक्षार्थ

                                             उषा ने चलाए बान,धरती में आई

जान,

ओस ने बचाए प्रान, लहराए धान हैं।

सौरभ-सुमन-संग, पवन ने भरे रंग, हौले-हौले छाई अंग,बावरी अनंग है।।

घूँघट भी खोल रही,नथनी भी डोल रही,

पायल भी बोल रही, प्रेम-रस घोलती।

मदिर-मदिर चाल,बिंदिया सजी है भाल,

आनन्द से लाल गाल,चली डोरे डालती।

मनुज भ्रमित हुए,निरख चकित हुए 

मस्तक नमित हुए,खिली मधुमालती।

रातरानी छिप गई,चम्पा तो महक गई,

कलियाँ चटख गईं,जिन्हें उषा पालती।।

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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत' 

हल्द्वानी,नैनीताल (उत्तराखण्ड) 

 


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