मुक्त-छंद---
स्वर्णाभा छा गई गगन में
हलचल हुई धरा के मन में
अँगड़ाई ली शीतल-शीतल
मन्द-मन्द मदमस्त पवन में।।
रजनी दौड़ी-दौड़ी छिप गई
दर-दर भटकी हवा बावरी
रश्मि-तीर छोड़े किरणों ने
खिली रोशनी,दिशा जग गई।।
सुमन,सुरभि मदहोश कर गईं
धीरे-से कलियाँ मुसकाईं,
कोमल डाली भी इतराई
अठखेली पत्तों से कर गई।।
धरती का श्रृंगार देख लो
अनुपम परिवर्तन निहार लो
सुबह-सवेरे दृश्य देख लो
स्वर्णाभा का जाल देख लो।।
मन सुन्दर तो जग सुन्दर है
मानव सुन्दरता सँवार लो
अम्बर,धरती,जल,जन-मन में,
स्नेह,प्यार भर दो जन-जन में।।
डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी, नैनीताल, (उत्तराखण्ड)
8171881903
रचना-तिथि----13.102020
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