हास्य-व्यंग्य---दोहेहास्य-व्यंग्य---दोहे
कवि,लेखक जितने मिले,सबका बुरा है हाल।
आँखों में चश्मा चढ़ा,पिचक रहे हैं गाल।।
साथियो!----
अर्द्धरात्रि तक जगे रहें,लिखने से मजबूर।
तन का ध्यान रखें नहीं, रोग लगे भरपूर।।
साथियो!----
दाँतों में कीड़ा लगा,आँतों में सब रोग।
फिर भी क़लम चला रहे,छोड़ दिए सब भोग।।
साथियो!----
केवल भावों में जिएँ,नहीं चाहिए माल।
सोचें, कैसे पड़ जाए,कण्ठ विजय की माल।।
साथियो!---
परहित ही जीते रहे,गाते रहते छंद।
जनहित ही रचना रचें,धन्य-धन्य कवि-वृन्द।।
साथियो!
----------×××××----------
डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखण्ड)
कवि,लेखक जितने मिले,सबका बुरा है हाल।
आँखों में चश्मा चढ़ा,पिचक रहे हैं गाल।।
साथियो!----
अर्द्धरात्रि तक जगे रहें,लिखने से मजबूर।
तन का ध्यान रखें नहीं, रोग लगे भरपूर।।
साथियो!----
दाँतों में कीड़ा लगा,आँतों में सब रोग।
फिर भी क़लम चला रहे,छोड़ दिए सब भोग।।
साथियो!----
केवल भावों में जिएँ,नहीं चाहिए माल।
सोचें, कैसे पड़ जाए,कण्ठ विजय की माल।।
साथियो!---
परहित ही जीते रहे,गाते रहते छंद।
जनहित ही रचना रचें,धन्य-धन्य कवि-वृन्द।।
साथियो!
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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखण्ड)
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