बाल-कविता-----
दौड़ रही आँगन में पोती
कभी चहकती,कभी फुदकती
गौरैया-सी चूँ-चूँ करती
फुर्र-फुर्र कर दाना चुगती।
तितली देख पकड़ने जाती
उछल-उछल कर,कोशिश करती
कभी भागती,फिर रुक जाती
इधर मचलती,उधर मटकती।
फूलों को भी वो चुन लाती
उनके सारे रंग बताती
देख-देखकर खुश हो जाती
भोला,प्यारा बचपन जीती।
ढेरों बातें खूब बनाती
दादी के संग गाना गाती
किस्से कभी कहानी सुनती
परियों, गुड़ियों में रम जाती।
सारा दिन सबको उलझाती
खेल-कूद कर जब थक जाती
बड़े प्यार से वो सो जाती
सुन्दर सपनों में खो जाती।
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डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी, नैनीताल (उत्तराखण्ड)
8171881903
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