ताटंक छंद---मात्रा--30।16,14पर यति।तुकान्त-समचरण।अन्त में तीन गुरु।
याद आ रहा हमें बचपना,बीत गया जो राहों में।
हम छोटे-छोटे पग धरते थे,घर,गलियाँ,दो राहों में।
सुबह हुई कब शाम हो गई?कुछ ना लेना-देना था।
रंग-बिरंगे,चन्द खिलौने, लेकर दिवस बिताना था।
माँ का हाथ बँटाना था,ना मन्दिर हमें सजाना।
पढ़ने-लिखने की कौन कहे?खेलों में समय बिताना।
गिल्ली-डंडा,छुपम-छुपाई,अड्डू ,कंचे या गोली। दूर-दूर तक चल देती थी,हम सब बच्चों की टोली।।
डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
हल्द्वानी, नैनीताल, (उत्तराखण्ड)
8171881903।
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