गीत - कैसी ये बनाई दुनिया कन्हाई।
1. तन मन दौलत भ्रमित किये हैं,
जन विष घोलत सहज पिये हैं,
भव सागर दिन रात डराये
गहरी हूँ बहाई चले आ सहाई।।
कैसी ये बनाई दुनिया कन्हाई।
2.भटक रही हूँ जीवन पथ पर,
उलझ गई मैं नयन नीर भर।
धड़कत उर अति ही घबराये,
ठहरी हूँ सताई विपदा दहाई।।
कैसी ये बनाई दुनिया कन्हाई।
3.विषय तृषित करते दिन रैना,
राह देख पथराये नैना।
बंधन मुक्ति दिलानेआजा,
सुमिरन कर धार बहाई।।
कैसी ये बनाई दुनिया कन्हाई।
---------------
डॉ०श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
No comments:
Post a Comment