गीत - शीत ऋतु
शीतल सुरभि सुगन्धित पल- पल,
कोमल कुसुम नमित हैं फल दल।।
पवन विटप सह उलझ बही है,
धवन धरा सब समझ रही है।
तुहिन कणों को हिला-हिला कर,
पावन मन में करती हलचल।।
शीतल सुरभि सुगन्धित पल- पल।
कोमल कुसुम नमित हुए फल दल।।
गगन हवन कर धुंध बनाता,
क्षितिज दिशा को छिपा मनाता।
ओझल किरणें व्याकुल नभ पर,
चीरें सतत श्वेत पट ढल-ढल।।
शीतल सुरभि सुगन्धित पल- पल।
कोमल कुसुम नमित हुए फल दल।।
हरित प्रांत श्वेताभ बने हैं,
शिखर बर्फ़ से ढके तने हैं।
घाट घाटियाँ नदी वादियाँ,
एक रंग भासित नभ-जल- थल।।
शीतल सुरभि सुगन्धित पल- पल।
कोमल कुसुम नमित हुए फल दल।।
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डॉ० गीता मिश्रा 'गीत'
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