Saturday, 24 February 2024

 गीत -  शीत ऋतु


शीतल सुरभि सुगन्धित पल- पल,

कोमल कुसुम नमित हैं फल दल।।


पवन विटप सह उलझ बही है,

धवन धरा सब समझ रही है।

तुहिन कणों को हिला-हिला कर,

पावन मन में करती हलचल।।


शीतल सुरभि सुगन्धित पल- पल।

कोमल कुसुम नमित हुए फल दल।।


गगन हवन कर धुंध बनाता,

क्षितिज दिशा को छिपा मनाता।

ओझल किरणें व्याकुल नभ पर,

चीरें सतत श्वेत पट ढल-ढल।।


शीतल सुरभि सुगन्धित पल- पल।

कोमल कुसुम नमित हुए फल दल।।


हरित प्रांत श्वेताभ बने हैं,

शिखर बर्फ़ से ढके तने हैं।

घाट घाटियाँ नदी वादियाँ,

एक रंग भासित नभ-जल- थल।।


शीतल सुरभि सुगन्धित पल- पल।

कोमल कुसुम नमित हुए फल दल।।


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डॉ० गीता मिश्रा 'गीत'


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