गीत - 16 मात्राभार
स ग प - | - - - - | ध नि ध ध |प - - -|धप गरे नि - | - - - - | ध निध स -|धनिध सं निधप -|
मुकुलित कलियाँ डोल रही हैं,
अतुलित मधुरस घोल रही हैं।
1.रंजित गंधित चन्दन वन है,
सज्जित मज्जित नन्दन वन है।
सौरभ मण्डित पुहुप वीथियाँ,
गुम्फित बन्धन खोल रही हैं।।
मुकलित कलियाँ डोल रही हैं,
अतुलित मधुरस घोल रही हैं।
2.अम्बर शोभित रजत चंद्रिका,
झंकृत करती उदधि तन्त्रिका।
सरवर तीरे रत्न सीपियाँ,
मुक्ता मणियाँ तोल रही हैं।।
मुकुलित कलियाँ डोल रही हैं।
अतुलित मधुरस घोल रही हैं।
3.सागर गगन धरा जगमग है,
उज्ज्वल नवल धवल डगमग है।
शीतल सरस मयङ्क कलाएँ
मुखरित हो कुछ बोल रही हैं।।
मुकुलित कलियाँ डोल रही हैं,
अतुलित मधुरस घोल रही हैं।।
4.रजत रूप रजनी ने पाया,
झिलमिल जल तट तरुवर छाया
मन्द पवन तन छूकर कहती ,
प्रकृति सदा अनमोल रही है।।
स ग प - | - - - - | ध नि ध ध |प - - -|धप गरे नि - | - - - - | ध निध स -|धनिध सं निधप -|
डॉ० श्रीमती गीत मिश्रा 'गीत'
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