Saturday, 24 February 2024

 घनाक्षरी --मात्रा भार---16

8  8  8  8=32

(सभी मात्राएँ लघु)एक प्रयोग 


नवल किरन सह,शशि निकसत जब,

तन मरकत मणि,सम दमकत सब।

मुख-पट सरकत,चमचम चमकत ,

विरह व्यथित मन,पल-पल तड़पत।।

इत-उत भटकत,प्रिय पग झटकत,

गिरत पड़त दर,उठत डगर पर।

अटपट गति लखि,पकड़त सुधिजन,

छिपत सदन मह,विहंसत परिजन।। 

------×× - - - -

डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'


No comments:

Post a Comment

  सुहानी-सुबह             कविता 1. रँग में अपने रंग दिया, रवि ने सुबह से ही गगन। देख नभ की अरुणिमा को, चारों दिशाएँ भी मगन।। 2.लालिमा भी प्य...