Saturday, 24 February 2024

 ताटंक  छंद---16-14=30 अन्त में तीन गुरु


मन्दिर की मूरत से हमको,

मिलता एक सहारा है ।

अन्तर्ज्योति जलाकर देखो,

सारा जगत हमारा है। 

मानव की नासमझी करती,

आपस में बँटवारा है।

मन का भ्रम हम दूर करें तो,

जीवन सबसे प्यारा है।। 

निज घट ज्योति जलाए रखना,

प्रभु ही पालनहारा है।

है सबकी अनमोल धरोहर,

तम को इसने मारा है।।

भिन्न कहाँ है ऊपर वाला, 

भव से उसने तारा है। 

आत्मा में ही परमात्मा है,

सबने ही स्वीकारा है।।

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डाॅ0 श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'


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