अनंद छंद -121 212 121 212 12 = 21 मात्राभार
14 - वर्णिक चतुष्पदी
मयंक रात में कला निखारता रहा।
चकोर चाँद की छटा निहारता रहा।
नदीश सीपियाँ गिरा बुहारता रहा।
हिमेश मोद से नदी उतारता रहा।।
शरारि व्योम को डरा पुकारती रही।
बहार रात से लिए गुजारती रही।
बटेर धूल को लगा उतारती रही।
खमाज राग 'गीत' भी सुधारती रही।।
मनोज झूम-झूम फूल तोलता रहा।
सरोज मीत चञ्चरीक खोलता रहा।
खद्योत रोशनी उड़ेल डोलता रहा।
जहान सो रहा प्रपात बोलता रहा।।
डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
No comments:
Post a Comment