बाल-रचना----घर का मन्दिर
दादी!मन्दिर में आने दो,
थोड़ी-सी जै-जै करने दो।
घंटी तुम तो रोज बजाती,
मुझको आज बजाने दो।।
आजा! मेरे भोले नटखट,
तुझे सिखा दूँ सबकुछ झटपट।
तू ही मेरा स्याम-सलौना,
जय-जय-जयश्रीराम कहो ना।।
रंग-बिरंगे कितने प्यारे!
पूजा के सामान तुम्हारे।
यहाँ बैठकर क्या करती हो?
बस माला ही क्या जपती हो?
अम्मा!पानी क्यों रक्खा है?
क्या कान्हा ने सब चक्खा है?
मुझको तो मन्दिर में सारे
लगते खेल-खिलौने प्यारे।।
पंचपात्र' में रखते ही जल,
गंगाजल बन जाता है।
मन्दिर का पानी प्रसाद फल
अमृत बनकर आता है।।
प्रभु की चम्मच'आचमनी'है,
इससे ही वो जल पीते हैं।
थोड़ा-सा बस उन्हें चढ़ा दो,
फिर हम सुख से जीते हैं।।
यह छोटी-सी 'चन्दनदानी,'
रंग-बिरंगी बड़ी सुहानी।
लाल-लाल रोली कहलाती,
पीला चन्दन रोज लगाती।
फूल चढ़ाकर उन्हें सजाती,
दीपक धूप कपूर जलाती।
नहलाकर,टीका करती हूँ,
मंत्र,श्लोक,भजन कहती हूँ।
दाँये कर से करूँआरती,
बाँये से घंटी बज जाती।
धीरे-धीरे चँवर डुलाती,
जोर-जोर से शंख बजाती।।
सबके सुख की करूँ कामना,
बढ़े और भी भक्ति-भावना।
प्रभु से मागूँ क्षमा,याचना,
तुम भी विद्या,बुद्धि माँगना।।
मैं भी पूजा रोज करूँगा,
ताली जोरों से पीटूँगा।
कान्हा जी को भोग लगाना
अम्मा तुमसे ही सीखूँगा।।
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डॉ० गीता मिश्रा 'गीत'
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