गीत - नववर्ष
स्थाई -
आया प्रथम नवमास डर-डर,
पाया मृदुल उपहास भर-भर।
अन्तरा -
मौसम ठिठुर-ठिठुर कर रहता,
शीतल लहर कहर सब सहता।
धुँध चदरिया ताने कहती,
यह कैसा नव वर्ष थर-थर।।
तुहिन गिराकर गगन रो रहा,
हिम पर्वत बस मगन सो रहा। झीलें नदी ताल जम जाते ,
जो गिरते बहते थे झर-झर।।
ठंडी हवा अकड़ कर बहती,
काँपी धरा सिकुड़ सब सहती
मुरझा रहीं प्रकृति की निधियाँ,
उपवन जीता है अब मर-मर।।
चैत्र माह मनभावन सबसे,
अलि!ऋतुराज आगमन जबसे।
कोंपल नईं खिलें वृन्तों पर,
साल नया परिवर्तन धर-धर।।
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डॉ० श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
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