Saturday, 24 February 2024

 गीत - नववर्ष


स्थाई -

आया प्रथम नवमास डर-डर,

पाया मृदुल उपहास भर-भर।


अन्तरा -

मौसम ठिठुर-ठिठुर कर रहता,

शीतल लहर कहर सब सहता।

धुँध चदरिया ताने कहती,

यह कैसा नव वर्ष थर-थर।।


तुहिन गिराकर गगन रो रहा,

हिम पर्वत बस मगन सो रहा। झीलें नदी ताल जम जाते ,

जो गिरते बहते थे झर-झर।।


ठंडी हवा अकड़ कर बहती,

काँपी धरा सिकुड़ सब सहती

मुरझा रहीं प्रकृति की निधियाँ,

उपवन जीता है अब मर-मर।।


चैत्र माह मनभावन सबसे,

अलि!ऋतुराज आगमन जबसे।

कोंपल नईं खिलें वृन्तों पर,

साल नया परिवर्तन धर-धर।।

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डॉ० श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'


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