वसंत पर दो दोहे
मन-आंगन प्रमुदित हुआ,हलचल करता कौन।
वासन्ती परिधान में,चला आ रहा मौन।।
सुमन-वाण ले हाथ में,भेद रहा सबओर।
कामदेव के रूप में,है वसन्त का शोर ।।
- - - - - - - - - -
डॉ० श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
सुहानी-सुबह कविता 1. रँग में अपने रंग दिया, रवि ने सुबह से ही गगन। देख नभ की अरुणिमा को, चारों दिशाएँ भी मगन।। 2.लालिमा भी प्य...
No comments:
Post a Comment