Saturday, 24 February 2024

  लघुकथा----घर का बन्धन


घने जंगलों के बीच ऊँची पहाड़ी पर छोटा-सा पत्थरों से बना मकान।  भुवन अपने बूढ़े,आखों की रोशनी खो चुके माता- पिता के साथ रहता था।घर में बँधी गौ माता आजीविका का एकमात्र सहारा थी। 

       बाईस साल के भुवन का विवाह,दूर पहाड़ी पर बसे निर्धन परिवार की कन्या तारा के साथ कर दिया गया। एक महीने बाद ही वह रुपये कमाने शहर चला गया। 

     गौमाता,बूढ़े सास-श्वसुर की सेवा पिछले तीन वर्षों से करते हुए तारा हर दिन दूर तक जाते टेढ़े-मेढ़े रास्तों को,ऊँचे टीले पर खड़ी पथराईआँखों से निहारती,पति के आने का इन्तजार करती है। पर भुवन तो घर के बंधन से मुक्त रहने शहर चला गया।

   आजकल शहर की चमक-दमक वाली ज़िन्दगी में रमजाने वाले भुवन जैसे लड़कों को अपना घर ही  बन्धन लगने लगता है।

 

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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'


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