मदिरा सवैया----नूतन-वर्ष
(7भगण211+गुरु)=22वर्ण)
नूतन-वर्ष विकास करे,
नव चेतनता नव भोर रहे।
पूनम चाँद दिखे नभ में,
ॠतु सावन भी चहुँ ओर रहे।
नाव चले तट से जब भी, भव-सागर में पर छोर रहे।
जीव-पतंग उड़े तब भी,
मधुसूदन के कर डोर रहे।।
ओस भरी जल हीर-कनी,
धरती पर अंकित शोभित हो।
कोष भरे सब नीरज भी,
खिल के महकें,मन मोहित हो।
बोल कहीं पिक के सुन के, बगिया अमिया सह पोषित हो।
साल नया सुख दे सबको,
अब निर्धन भी नहिं शोषित हो।
पावन-सी किरणें नित ही,
थल में नव-जीवन डाल सकें।
सावन के घट भी सज के,
धरती पर अंकुर पाल सकें।
दोहन कीअब बात न हो,
हर शोषित भी धन जोड़ सकें।
मोहन की मुरली सुन के,
ब्रज के यमुना-तट दौड़ सकें।
दारुण भीषण थी विपदा,अब तो प्रभु केवल तारण हो।
कारण तो हम ही सब थे,
पर हे!प्रभु ताप न मारण हो।
साल नया नव-यौवन दे,
फिर से उगना परती पर हो।
काल बुरा मिट जाए यहाँ,
सबका रहना धरती पर हो।।
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डाॅ0श्रीमती गीता मिश्रा 'गीत'
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